तपोस्थली स्थित भगवान संभवनाथ की जन्मस्थली।
कटरा (श्रावस्ती)। बुद्ध की तपोस्थली श्रावस्ती को जैन तीर्थंकर भगवान संभवनाथ की जन्मस्थली होने का गौरव भी प्राप्त है। उपेक्षा के कारण यह स्थल जर्जर अवस्था में है। यहां बिजली, पानी व सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव से जैन धर्मावलंबियों में मलाल है।
अचरावती (अब राप्ती नदी) के तट पर बसी श्रावस्ती कभी उत्तर कौशल की राजधानी थी। भगवान महावीर से पहले जिन 16 महाजनपदों व छह महानगरों की चर्चा प्राचीन साहित्य में होती है। उनमें श्रावस्ती का भी नाम है। यह नगरी शुरू से तीर्थ क्षेत्र के रूप में मान्य रही। मौर्य युग में सम्राट अशोक ने कई स्तंभ व समाधि स्तूप बनवाए थे। श्रावस्ती सम्राट अशोक के पौत्र सम्राट सम्प्रति शंभू नाथ की जन्मभूमि भी है। यहां उन्होंने स्तूप और मंदिरों का निर्माण भी कराया था। जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ की जन्मस्थली भी श्रावस्ती रही है। यहां कई जैन आचार्य की प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। संभवनाथ की जन्मस्थली के ऊपर का गुंबद उत्तर कालीन भारतीय अफगान शैली का है। इसे प्राचीन जैन मंदिर के शिखर के स्थान पर बनाया गया था।
जैन अनुयायी महेंद्र जैन ने बताया कि इस मंदिर के आसपास 18 जैन मंदिर थे। इन अवशेषों पर पेड़ व झाड़ियां उगी हैं। मान्यता है कि भगवान चंद्र प्रभु का जन्म स्थान इन ध्वस्त मंदिरों में से कोई एक था। दिगंबर जैन मंदिर के अध्यक्ष संजीव जैन का कहना है कि पुरातत्व विभाग की लापरवाही के कारण यह स्थल उपेक्षा का शिकार है। श्रावस्ती के गर्भ में श्रमण संस्कृति का अपार वैभव दबा है। अभी तक के भूखनन से प्राचीन श्रावस्ती की जानकारी में जो तथ्य सामने आए हैं, उनमें पूर्व श्रावस्ती की सीमा का पता चला है। यहां करीब 365 एकड़ भूमि पुरातत्व के संरक्षण में है। वर्तमान में प्राचीन श्रावस्ती जंगल के रूप में है। इसे महेठ बोलते हैं। न तो यहां बिजली-पानी की उचित व्यवस्था है और न ही भगवान संभवनाथ की जन्मस्थली के आसपास पार्क बनाकर उसे सुसज्जित कराया जा रहा है।