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अब फायर लाइन से गुजरेगी इंडोनेपाल रोड

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इंडोनेपाल की खबर में श्रावस्ती का जंगल मध्य से निकला मार्ग। - फोटो : SRAWASTI
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श्रावस्ती। टाइगर व अन्य जीवों के लिए रिजर्व सोहेलवा वन्य जीव विहार तथा बहराइच के कतर्निया वन क्षेत्र के दो सौ वर्ष पुराने पेड़ों को काट कर अब इंडोनेपाल रोड नहीं निकाली जाएगी। यह रोड अब जंगल के फायर लाइन से निकलेगी। इसके लिए लोक निर्माण विभाग ने शासन को प्रस्ताव बनाकर भेजा है। उम्मीद है इसको जल्द ही मंजूरी मिलेगी। इसका कारण परियोजना का रूट बदलने से श्रावस्ती, बलरामपुर व बहराइच में ही लगभग पैंतीस हजार पेड़ों का कटने से बच जाना है। इस परियोजना से चार अन्य जिलों के भी पेड़ बचेंगे।
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भारत नेपाल सीमा को सुरक्षित करने के लिए वर्ष 2011 में गृह मंत्रालय ने इंडोनेपाल सीमा पर सड़क को मंजूरी दी थी। यह परियोजना उत्तर प्रदेश में श्रावस्ती सहित सात जिलों से होकर गुजरनी थी। इस सड़क का निर्माण ठीक नोमैंस लैंड से सट कर होना था।
सात जिलों में यह परियोजना 570 किलोमीटर की थी। अकेले श्रावस्ती में ही यह परियोजना 105 किलोमीटर की है। निर्माण के समय से ही यह परियोजना खटाई में पड़ गई थी। इसका कारण परियोजना के बीच वन क्षेत्र का पड़ना था। खास तौर पर टाइगर व अन्य जीवों के लिए रिजर्व अभ्यारण्य का होना था।
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देखा जाए तो 570 किलोमीटर की इस परियोजना में 299 किलोमीटर का क्षेत्र टाइगर रिजर्व, सेंच्युरी (वन्य जीव अभ्यारण्य) और आरक्षित वन क्षेत्र का है। बाकी भूमि किसानों की है। जिस क्षेत्र में किसानों की जमीन पड़ती है, वहां विभाग ने किसानों से जमीन खरीद कर सड़क का निर्माण करा दिया, लेकिन जहां भी वन क्षेत्र था वहां निर्माण कार्य रुक गया। इसका कारण स्टेट बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ की ओर से एनओसी न देना था।
यदि इस परियोजना को वन विभाग अपनी एनओसी दे देता तो उसमें बड़ी संख्या में पेड़ काटे जाते। यही नहीं श्रावस्ती का सोहेलवा, पीलीभीत का दुधवा व बहराइच का कतर्निया जंगल दो भागों में बट जाता। इसके साथ ही अकेले श्रावस्ती व बलरामपुर के सोहेलवा जंगल में ही करीब 35 हजार पेड़ काटे जाते। इसमें श्रावस्ती में ही 11036 हजार पेड़ काटे जाने थे। बाकि बलरामपुर में काटे जाते।
इसी कारण से केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के साथ साथ यूपी के वन विभाग ने इस परियोजना को अब तक अपनी एनओसी नहीं दी थी। अब बिना पेड़ काटे या फिर कम पेड़ काट कर ही इस परियोजना को पूरा किया जाने वाला है। अब यह सड़क बीच जंगल से न निकल कर फायर लाइन से निकाली जाएगी। यह जंगल का वह क्षेत्र है, जहां पेड़ या तो होता ही नहीं या फिर कम संख्या में होते है। यह लगभग पंद्रह से बीस मीटर चौड़ा होता है।
सड़क की चौड़ाई भी होगी कम
पुराने सीमांकन में सड़क को 9 से 15 मीटर चौड़ा रखा गया था। अब इस चौड़ाई को 4 से 7 मीटर करने पर सहमति बनी है। इस पर जल्द ही मोहर लग जाएगी।
यहां कटने थे इतने पेड़
सुहेलवा वन्य जीव विहार श्रावस्ती व बलरामपुर के जंगलों के बाहर से ही सड़क निकालने पर 23 हजार की जगह मात्र 1500 या उससे भी कम पेड़ काटे जाएंगे। कतर्निया घाट (बहराइच) में पहले से मौजूद सड़क का इस्तेमाल करने से 12 हजार पेड़ बचेंगे। लखीमपुर खीरी में दुधवा नेशनल पार्क के एकदम बाहर दक्षिण हिस्से से सड़क निकाली जाएगी। इससे पहले जहां 11-12 हजार पेड़ कट रहे थे, वहीं अब एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा। महराजगंज में नहर किनारे की पटरी को पक्का किया जाएगा। सिद्धार्थनगर में पहले भी रूट जंगल क्षेत्र से बाहर चिह्नित किया गया है।
इंडोनेपाल सड़क श्रावस्ती, बलरामपुर, बहराइच महराजगंज, सिद्धार्थनगर, लखीमपुर व पीलीभीत को आपस में जोड़ती है। इस सड़क निर्माण में पहले फारेस्ट विभाग का एनओसी न मिल पाने के कारण कार्य रुका हुआ है, लेकिन अब इस पूरी परियोजना में परिवर्तन हुआ है। नया प्रस्ताव शासन में विचाराधीन है। जल्द ही इसको मंजूरी मिल जाएगा। नए परियोजना में पेड़ बहुत ही कम काटे जाएगे।
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- डीएन राम, एक्सईएन, इंडोनेपाल
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