श्रावस्ती के जेतवन परिसर में प्रार्थना करते अनुयायी।- संवाद
श्रावस्ती। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती शनिवार को थाईलैंड से आए अनुयायियों के 40 सदस्यीय दल से गुलजार रही। सभी ने बौद्ध भिक्षु भंवरानंद के नेतृत्व में पारंपरिक ढंग से जेतवन परिसर में पूजन-अर्चन किया। इस दौरान बौद्ध सभा का भी आयोजन किया गया।
बौद्ध सभा को संबोधित करते हुए भिक्षु भंवरानंद ने कहा कि राजकुमार सिद्धार्थ के मन में बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु देखकर गहरा दुख था। उन्होंने 29 साल की आयु में सत्य की खोज के लिए सांसारिक जीवन और राजसी सुखों का त्याग कर दिया। इस दौरान सिद्धार्थ ने वर्षों तक घोर तपस्या की, लेकिन बाद में उन्हें अहसास हुआ कि यह व्यर्थ है।
उन्होंने त्याग और भोग के बीच मध्यम मार्ग को अपनाया। बोधगया में पीपल (बोधि) के वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए उन्होंने मन की प्रकृति को समझा और ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद सिद्धार्थ बुद्ध (ज्ञानी) कहलाए। सभा के बाद अनुयायियों ने तपोस्थली के विभिन्न स्थलों का भ्रमण कर उनके इतिहास की जानकारी ली।