गंधकुटी में पुष्प पूजा करते श्रीलंका के अनुयायी। -संवाद
कटरा। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती शनिवार को श्रीलंका से आए अनुयायियों के 25 सदस्यीय दल से गुलजार रही। सभी ने बौद्ध भिक्षु देवानंद के नेतृत्व में पारंपरिक ढंग से गंधकुटी में पुष्प पूजा की। इस दौरान बौद्ध सभा का भी आयोजन किया गया।
बौद्ध सभा को संबोधित करते हुए भिक्षु देवानंद ने कहा कि भारतीय संस्कृति में पुष्प का उच्च स्थान है। देवी-देवताओं और भगवान पर पुष्प चढ़ाए जाते हैं। अनुष्ठान, संस्कार व मांगलिक कार्यों को बिना पुष्प अधूरा समझा जाता है। पुष्पों की सुगंध से देवता प्रसन्न होते हैं।
बताया कि पुष्प हमारे जीवन में उल्लास, उमंग व प्रसन्नता के प्रतीक हैं। पापों को भगाने और श्रेष्ठ फल प्रदान करने के कारण इन्हें पुष्प कहा जाता है। जो शोभा देती है, वह माला है। कमल अथवा पुंडरीक की माला को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। पूजन के बाद अनुयायियों ने कौशांबी कुटी, बोधिवृक्ष, सूर्यकुंड, शिवली स्तूप, कच्ची कुटी-पक्की कुटी आदि का भ्रमण कर उनके इतिहास की जानकारी ली।