श्रावस्ती में फरुआही नृत्य करते कलाकार। -संवाद
श्रावस्ती। डीजे की कानफोड़ू आवाज व आर्केस्ट्रा की चकाचौंध में पारंपरिक नृत्य व लोक कलाएं विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं। करीब डेढ़ दशक पूर्व तक फरुआही नृत्य एक विशेष जाति वर्ग की पहचान हुआ करता था, लेकिन अब यदा-कदा ही यह नृत्य देखने को मिलता है। ऐसे में पारंपरिक कलाकारों का रोजगार भी लगभग बंद हो चुका है।
सहालग का दौर शुरू होते ही लोग डीजे व आर्केस्ट्रा पार्टियों को बुक कराने के लिए दौड़ पड़ते हैं। कुछ घंटे के मनोरंजन के लिए जहां लोग लाखों रुपये पानी की तरह बहा देते हैं, वहीं तीन से पांच हजार रुपये तक में पूरी रात नृत्य करने वाले फरवारों को अब कोई पूछता तक नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में कभी-कभार ही उन्हें थोड़ी-बहुत तवज्जो मिल पाती है।
मांग घटी तो रोजगार भी छिना
ओरीपुरवा निवासी फरवार नर्तक कृपाराम यादव बताते हैं कि लगभग 10 वर्ष पूर्व तक उनकी तारीखें पहले से ही बुक हो जाती थीं। लोग एडवांस रकम भी जमा कर देते थे, लेकिन अब उनकी कला का कोई मोल नहीं है। ऐसे में उनका रोजगार भी बंद हो गया है। अब खेती-बाड़ी के सहारे ही जीवनयापन हो पाता है। इसी गांव के चेतराम बताते हैं कि जब से डीजे का चलन शुरू हुआ है, तब से लोगों में फरवार नृत्य का आकर्षण भी मद्धिम पड़ गया है।
ये होते थे साज-ओ-सामान
फरवार शैली में विशेष रूप से पुरुष ही नृत्य करते हैं। बनियान, धोती व गमछे के साथ ही जांघों पर घुंघरू के बने परिधान पहने जाते हैं। साथ ही नगाड़ा, हारमोनियम व झांझ की ताल पर फरवारे विभिन्न स्वांग कर नृत्य करते हुए गीत गाते हैं।
मिले प्रोत्साहन तो संरक्षित हों कलाएं
नर्तक कृपाराम का मानना है कि यदि सरकार उनकी कला के जरिये अपनी योजनाओं का प्रचार-प्रसार करए व अन्य माध्यमों से उन्हें प्रोत्साहित करे तो लोक कलाएं विलुप्त होने से बच सकती हैं। साथ ही उनके जैसे कई अन्य को रोजगार भी मिल सकता है।