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बादलों के दगा देने से बढ़ी किसानों की मुश्किल

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श्रावस्ती। भादों मास का तीसरा सप्ताह बीतने को है। वहीं क्वार मास से वर्षा ऋतु का समापन मान लिया जाता है। ऐसे में भादों में बादलों के दगा दे जाने से किसानों की मुश्किलें बढ़ने लगी हैं। अब जब धान की फसल को पानी की बेहद आवश्यकता है तब खेत में दरार पड़ने लगी है।
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फसल को बर्बाद होने से बचाने के लिए किसान पंपिंग सेटों का सहारा लेने को विवश हो चुके हैं। इससे जहां फसल की लागत बढ़ रही है। वहीं पैदावार के प्रभावित होने का खतरा भी बढ़ गया है।
तराई में भादों मास में ताल तलैया ही नहीं खेत खलिहान भी पानी से लबालब दिखाई देते थे। वहीं कछार के गांवों में खेत ही नहीं गांव भी पानी से जलमग्न रहते थे। लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं है। भादों मास बीतने को मात्र डेढ़ सप्ताह ही शेष है। इस दौरान न तो ताल तलैया पानी से सराबोर है और न ही खेत खलिहान ही।
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विगत एक पखवारे से लगातार चल रही तेज पूर्वा हवाएं खेतों की नमी को तेजी से सुखा रही है। वहीं आसमान पर उमड़ घुमड़ रहे घने काले बादल हल्की बूंदा बांदी कर वापस लौट रहे हैं। इससे जहां खेतों में लगी मक्का, अरहर, गन्ना आदि फसलें पानी के अभाव में खराब हो रही है। वहीं धान के खेतों में पानी न होने से उनमें दरार आ गई है। पानी के अभाव में अब धान की फसल भी पीली पड़ने लगी है।
मौजूदा समय देखा जाए तो धान गलेथा (पीक) पर है। ऐसे में खेतों में पानी की बेहद आवश्यकता है। ऐसे समय में धान की फसल को सूखने से बचाने के लिए किसानों को पंपिंग सेटों का सहारा लेना पड़ रहा है। किसानों का मानना है कि ऐसा करने से न सिर्फ फसल की लागत बढ़ेगी, बल्कि पैदावार भी प्रभावित होगी। यदि एक सप्ताह बरसात और न हुई तो क्वार मास में बरसात की कोई संभावना नहीं बचेगी। जिससे फसल का नुकसान होना तय है।
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