बौद्ध तपौस्थली में पूजा अचर्ना करते बौद्ध भिक्षु।
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कटरा (श्रावस्ती)। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती शुक्रवार को अनुयायियों से गुलजार रही। इस दौरान थाईलैंड से आए उपासकों ने बौद्ध भिक्षु दीपालोक महाथेरों के नेतृत्व में तपोस्थली में कैंडल जलाकर विश्व शांति के लिए विशेष प्रार्थना की।
बौद्ध भिक्षु दीपालोक महाथेरो ने पूजन के दौरान कहा कि गृहत्याग के बाद सिद्धार्थ ने अनोमा नदी के तट पर अपने सिर को मुंडवा कर भिक्षुओं का काषाय वस्त्र धारण किया। सात वर्ष तक सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में इधर उधर भटकते रहे। सर्वप्रथम वैशाली के समीप अलार कलाम (सांख्य दर्शन के आचार्य) नामक संयासी के आश्रम में पहुंचे।
इसके बाद उन्होंने उरुवेला (बोधगया) के लिए प्रस्थान किया। जहां उन्हें कौडिन्य सहित 5 साधक मिले। छह वर्ष तक अथक प्रयास के बाद तथा घोर तपस्या के बाद 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा की रात पीपल वृक्ष के नीचे निरंजना (पुनपुन) नदी के तट पर सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ। ज्ञान प्राप्ति के बाद ही सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुए।
उरुवेला से बुद्ध सारनाथ (ऋषि पत्तनम एवं मृगदाव) आये यहां पर उन्होंने पांच ब्राह्मण संन्यासियों को अपना प्रथम उपदेश दिया। इसे बौद्ध ग्रंथों में धर्म चक्त्रस्-प्रवर्तन नाम से जाना जाता है। बौद्ध संघ में प्रवेश सर्वप्रथम यहीं से प्रारंभ हुआ। महात्मा बुद्ध ने तपस्या एवं काल्लिक नामक दो शूद्रों को बौद्ध धर्म का सर्वप्रथम अनुयायी बनाया।
बुद्ध ने अपने जीवन के सर्वाधिक उपदेश श्रावस्ती में दिए। उन्होंने मगध को अपना प्रचार केन्द्र बनाया। बुद्ध के प्रसिद्ध अनुयायी शासकों में बिम्बिसार, प्रसेनजित तथा उदयन थे। बुद्ध के प्रधान शिष्य उपालि व आनंद थे। सारनाथ में बौद्धसंघ की स्थापना हुई।
महात्मा बुद्ध अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में हिरण्यवती नदी के तट पर स्थित कुशीनार पहुंचे। इसे बौद्ध परंपरा में महापरिनिर्वाण के नाम से भी जाता है। मृत्यु से पूर्व कुशीनारा के परिवार्जक सुभच्छ को उन्होंने अपना अंतिम उपदेश दिया था। महापरिनिर्वाण के बाद बुद्ध के अवशेषों को आठ भागों में विभाजित किया गया था। इस मौके पर बौद्ध भिक्षु आनंद सागर, ज्ञान सागर, माता विद्यावती सहित उपासक मौजूद रहे।