कटरा (श्रावस्ती)। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती गुरुवार को अनुयायियों से गुलजार रही। श्रीलंका, वर्मा व कोरिया से आए उपासकों ने गंधकुटि पर विशेष प्रार्थना की। इसके साथ ही विभिन्न मूमेंटों का भ्रमण कर उनकी ऐतिहासिक जानकारी भी हासिल की।
बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती में गुरुवार को कोरिया से 60, श्रीलंका से 250 व वर्मा से 110 सदस्यीय अनुयायियों का दल पहुंचा। दल में शामिल सदस्यों ने गंधकुटि पर मत्था टेका। इस दौरान बौद्ध भिक्षु दीपालोक महाथेरो ने कहाकि सिद्धार्थ बचपन से ही अत्यंत करुण हृदय वाले थे। वह किसी का भी दुख नहीं देख सकते थे।
21 वर्ष की आयु में कपिलवस्तु की गलियों में उनकी दृष्टि चार दृश्यों पर पड़ी। यह दृश्य थे एक वृद्ध विकलांग व्यक्ति, एक रोगी, एक पार्थिव शरीर, और एक साधु। इन चार दृश्यों को देखकर सिद्धार्थ समझ गए थे कि सबका जन्म होता है। सब को बुढ़ापा आता है, सब को बीमारी होती है, और एक दिन सब मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
इससे व्यथित होकर उन्होंने अपनी पत्नी, पुत्र एवं राजपाट त्याग कर साधु जीवन अपना लिया। वह जन्म, बुढ़ापा, दर्द, बीमारी और मृत्यु से जुड़े सवालों की खोज में निकल गए। पूजन के उपरांत सभी उपासकों ने शिवली स्तूप, आनंद बोधि, सभामंडप, कौशांबी कुटि, अंगुलिमाल स्तूप, राहुल कुटी, पूर्वाराम विहार आदि का भ्रमण कर उसकी ऐतिहासिक जानकारी हासिल की। इस मौके पर सुख सागर, आनंद सागर, नागलोक, नाग सागर, माता विद्यावती, नागपाल आदि बौद्ध भिक्षु तथा उपासक मौजूद रहे।