श्रावस्ती। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती में मंगलवार से वर्षावास पूजा प्रारंभ हुई। बौद्धभिक्षु डिकुंग क्यागुन रिपोनछे के दिशा निर्देशन में कई देशों से आए भिक्षुओं ने इसका शुभारंभ किया। इस दौरान बौद्ध भिक्षुओं ने गंधकुटि पर मत्था टेका। इसके बाद बौद्ध सांस्कृतिक महासभा तक जुलूस भी निकाला।
बौद्ध अनुयायियों व भिक्षुओं ने मंगलवार को बुद्ध विहार में वर्षावास पूजा प्रारंभ की। इस दौरान बौद्ध धर्मगुरु डिकुंग रिपोनछे ने कहा कि वर्षावास का बौद्धों में विशेष महत्व है। इस दौरान बौद्ध भिक्षुओं को यात्रा करना वर्जित है। भिक्षु चाहे विश्व के किसी भी कोने में रहे, उन्हें वहीं रहकर बुद्ध के करुणा, शील और त्याग के सिद्धांतों का पूर्णरूपेण पालन करना होता है।
गौतम बुद्ध ने श्रावस्ती के जंगलों में 24 वर्षावास व्यतीत किया था। वर्मा के विद्वान सतवीर प्रमोक्षा ने कहा कि वर्षावास पूजा श्रावस्ती में विलुप्त हो रही थी। इसका शुभारंभ बौद्ध सांस्कृतिक महासभा पूना की ओर से शुरू किया गया। इसमें श्रीलंका, वर्मा, मलेशिया, तिब्बत, भूटान, थाईलैंड, भारत, अमेरिका आदि देशों के 100 बौद्ध भिक्षु श्रावस्ती में रहकर वर्षावास पूजन करेंगे।
16 जुलाई आषाढ़ पूर्णिमा से प्रारंभ होकर यह पूजा 16 अक्तूबर तक चलेगी। प्रोफेसर बांगचुंग ने कहाकि वर्षावास पूजन के पीछे तर्क यह है कि वर्षा ऋतु में कई तरह के छोटे छोटे जीव जन्म लेते हैं। जो विचरण करने से पैर से दब सकते हैं। इससे जीव की हत्या होती है। इससे बचने के लिए तीन माह एक जगह व्यतीत किया जाता है।
बौद्ध भिक्षु खेबोरनडोल ने कहा कि वर्षावास का प्रारंभ भगवान बुद्ध ने किया था। बुद्ध ने कहा था कि वर्षाकाल में गांवों में भिक्षाटन के लिए नहीं जाएं। भिक्षुओं के समूह में चलने से कृषि को काफी नुकसान हो सकता है, तथा कीड़े मकोड़ों का भी डर रहता है। इस मौके पर बौद्ध भिक्षु जक्शन लामा, अशोक बौद्ध, बौद्धभिक्षु देवेंद्र आदि मौजूद रहे।