हाथों के हुनर से पकड़ी कामयाबी की राह
गिरिराज सिंह
शामली। चूल्हे-चौके में व्यस्त रहने वाली ग्रामीण महिलाओं ने हाथों के हुनर से कामयाबी की राह पकड़ी है। घरों में रहकर ही उन्होंने अपनी कारीगरी के दम पर अच्छी कमाई शुरू कर दी है। महिलाएं समूह से जुड़कर घरों का सजावटी सामान बनाती हैं। गुड़िया, देवी-देवताओं की मूर्ति के लिए कपड़े, सजावटी नारियल, टेडीवियर, बैग और अन्य कई तरह के सामान तैयार करती हैं। जिला मुख्यालय में चल रहे दिवाली मेले में 60 समूहों ने अपने उत्पादों के स्टाल लगाए हैं।
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शौक को बनाया कमाई का जरिया
शामली। गांव बुच्चाखेड़ी में सरस्वती स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष संगीता हाईस्कूल तक पढ़ी हैं। उन्हें बचपन से ही कढ़ाई-बुनाई और हैंडीक्राफ्ट का शौक था। तीन साल पहले वह समूह से जुड़ी और अब सजावटी नारियल, बंदनवार, शीशे में लगी प्रतिमाएं, पूजा की थाली, गुड़िया, टेडीवियर, आइसक्रीम स्टिक से सजावटी सामान बनाने शुरू किए। कहती हैं कि शादी और त्योहारी सीजन में उनके बनाए सामान की काफी मांग रहती है। पति नीरज पानीपत में प्राइवेट नौकरी करते हैं। तीन साल पहले संगीता ने समूह से दस हजार रुपये कर्ज लेकर काम शुरू किया। अब घर पर काम करके ही तीन-चार हजार रुपये महीना की कमाई कर लेती हैं। मेले में उनका स्टॉल आकर्षण का केंद्र है।
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यू-ट्यूब से सीखकर करती हैं काम
बुच्चाखेड़ी की संगीता बताती हैं कि वह नई-नई चीजें बनाने में यू-ट्यूब की भी मदद लेती हैं। विभिन्न प्रकार के आकर्षक मॉडल एवं सजावटी सामान बनाना सिखाने के लिए कई यू-ट्यूब चैनल हैं। इन पर सीखकर वह वैसा ही सामान घर पर तैयार करती हैं।
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हाथों से गूंथती हैं कान्हा के झूले और झूमर
शामली। गांव खोडसमा निवासी शाइस्ता और समूह सखी कविता तीन साल पहले समूह से जुड़ी। 15 हजार रुपये लेकर काम की शुरुआत की। कविता बताती हैं कि उन्होंने कहीं ट्रेंनिंग नहीं लीं। घर की महिलाओं के साथ बैठकर ही धागे एवं डोरियों से गणेश जी, सजावटी आइना, लटकन, कान्हा जी के झूले, झूमर, पॉट, तितल, कुशन आदि बनाना सीखा। दिवाली पर उन्हें लगभग 20 हजार रुपये की बचत हो जाती है। उनके साथ दो और महिलाएं इसी तरह के उत्पाद अपने हाथों से तैयार करती हैं। उनके बनाए उत्पाद 200 से 600 रुपये तक के हैं।
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मांग के अनुरूप नहीं हो पाता उत्पादन
शामली। गांव हिंगोखेड़ी की अनीता बैग बनाती हैं। वह भी लगभग तीन साल से तुलसी स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हैं। पहले उनके पास एक ही मशीन थी। समूह से 20 हजार रुपये का ऋण लेकर दो और मशीनें लीं। समूह सचिव रेखा व एक अन्य महिला मिलकर बैग तैयार करती हैं। हैंगिंग बैग के साथ ही स्कूल बैग भी बनाती हैं। वह बताती हैं कि गांव से ही उन्हें इतने आर्डर मिल जाते हैं कि उनकी भी पूर्ति नहीं कर पाती। प्रतिमाह पांच से छह हजार रुपये कमा लेती हैं। बैग की सिलाई उन्होंने घर पर ही सीखी और अपने इसी हुनर के दम पर कमाई भी कर रही हैं।
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इन्होंने कहा...
स्वयं सहायता समूह की महिलाएं बहुत अच्छे उत्पाद तैयार करती हैं। तीन दिवसीय दिवाली मेले में उनके उत्पादों के स्टॉल लगाए गए हैं। लोग सामान खरीदकर ले जा रहे हैं।
- शंभूनाथ तिवारी, सीडीओ।
शामली माजरा रोड पर दीपवाली मेले में अपने स्टाल पर मौजूद कविता देवी और अनिता।- फोटो : SHAMLI
शामली माजरा रोड पर दीपावली मेले में सरस्वती समूह के स्टाल पर मौजूद संगीता देवी।- फोटो : SHAMLI
शामली माजरा रोड पर दीपावली मेले में सलोनी समूह के स्टाल पर बिकते उत्पाद।- फोटो : SHAMLI