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किराना घराना शास्त्रीय संगीत की दुनिया में बेमिसाल धरोहर

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2016 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से अवार्ड लेते उस्ताद मशकूर अली खां फाइल फोटो। - फोटो : SHAMLI
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किराना घराना शास्त्रीय संगीत की दुनिया में बेमिसाल
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मोहम्मद रफी और भीमसेन जोशी का रहा किराना घराना से ताल्लुक
संवाद न्यूज एजेंसी
कैराना (शामली)। दानवीर कर्ण की बसाई नगरी कैराना को संगीत के सुरों से किराना घराना (कैराना) ने देश और दुनिया में बेमिसाल शोहरत दिलाई। किराना घराना के संगीतकारों ने शास्त्रीय संगीत में ऊंचे मुकाम पेश कर कैराना को पूजनीय बनाया। इसके चलते 1970 में मन्ना डे कैराना में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए तो उन्होंने जूते उतारे और नंगे पैर चलकर कैराना की मिट्टी को माथे से लगाया।
किराना घराने के जनक अब्दुल करीम खां 11 नवंबर 1872 को कैराना में उस्ताद काले खां के घर पैदा हुए थे। अब्दुल करीम खां ने अपने वालिद व चाचा से शास्त्रीय संगीत का ककहरा सीखा था। 20 वर्ष की उम्र में अब्दुल करीम खां जयपुर, बड़ौदा व मैसूर राजघराने की शान बने। अब्दुल करीम खां को अपनी जन्मभूमि कैराना से इतनी मोहब्बत थी कि उन्होंने अपने संगीत को किराना घराना का नाम दिया। अब्दुल करीम खां ने उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत परंपरा के बीच सेतु का काम किया। किराना घराना विशिष्ट ख्याल गायकी, ठुमरी, दादरा, भजन और मराठी नाट्य संगीत गायन के लिए प्रसिद्ध हुआ। अब्दुल करीम खां कर्नाटक संगीत शैली में भी पारंगत थे। इनका मैसूर दरबार से भी गहरा नाता रहा था। उन्हें सारंगी, वीणा, सितार और तबला में महारत हासिल थी। किराना घराने का नाम देश-विदेश में बढ़ता गया। जिसके चलते एचएमवी कंपनी के ग्रामोफोन रिकॉर्डर वाले स्टीकर पर भी अब्दुल करीम खां के पालतू कुत्ते का फोटो छपवाया गया।
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किराना घराने के मशहूर सितारे
किराना घराना के गनापत बुआ, वाहिद खान, सवाई गंधर्व, सुरेश बाबू माणे, गंगूबाई हंगल, भीमसेन जोशी, हीराबाई बादोड़कर, उस्ताद शकूर खान, माणिक वर्मा, प्रभा आत्रे और श्रीकांत देशपांडे शास्त्रीय संगीत में अपनी व किराना घराने की अमिट छाप छोड़ चुके हैं। गंगूबाई हंगल को 1971 में पद्म भूषण, 1973 में संगीत नाट्य एकेडमी और 2002 में पद्म विभूषण से नवाजा गया था।
भीमसेन जोशी ने कैराना की धरती को किया सजदा
देश में हालात कैसे भी हुए यहां हिंदू-मुस्लिम एक साथ मिलकर रहे। 2013 से लेकर 2017 तक कैराना ने पलायन का दंश झेला। इसके बावजूद हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल कैराना की धरती है। 1964 में पंडित भीमसेन जोशी कैराना आए और अब्दुल करीम खां के जर्जर मकान के आगे सजदा किया। मकान की देहरी पर नजराने के तौर पर कुछ रुपये रखकर लौट गए। बॉलीवुड के गायक मन्ना डे 1970 में मेला छड़ियान में संगीत कार्यक्रम में शिरकत करने कैराना आए थे। कार से नीचे आने से पहले उन्होंने जूते उतारकर कार में ही छोड़ दिए और नंगे पांव कैराना की धरती पर घूमे। मन्ना डे ने कहा था कि कैराना की धरती संगीतकारों के लिए तीर्थ है। यहां जूते पहनकर चलना कैराना की शान में गुस्ताखी होगी। बॉलीवुड गायक मोहम्मद रफी भी अब्दुल करीम खां के शिष्य रहे।
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कैराना छोड़ने की टीस बरकरार : उस्ताद मशकूर अली खां
कोलकाता स्थित संगीत रिसर्च एकेडमी के प्रवक्ता और अब्दुल करीम खां के पौत्र उस्ताद मशकूर अली खां कैराना आते रहते हैं। करीब 12 साल पहले मोहल्ला पीपलोतला में उन्होंने अपना पैतृक घर अवैध कब्जे के डर से बेच दिया था। मशकूर अली खां ने फोन पर बताया कि कैराना की गलियां और यमुना का किनारा उनके जहन में आज भी तरोताजा है। कैराना से बिछोह बहुत दर्द देता है। देश-विदेश के उनके बहुत से छात्र किराना घराना की धरती कैराना दिखाने का आग्रह करते हैं। ऐसे में सोचता हूं कि कैराना ले जाकर इन्हें उस्ताद अब्दुल करीम खां व अन्य बुर्जुगों की क्या निशानी दिखाऊंगा। यह दर्द हमेशा दिल में रहता है। 2 जनवरी 1967 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनके वालिद पद्मश्री उस्ताद शकूर खान को संगीत नाटक एकेडमी अवार्ड से नवाजा था। उन्हें भी 4 अक्टूबर 2016 को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने संगीत नाटक एकेडमी अवार्ड दिया था।
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