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ये जब्र भी देखा हैं तारीख की नजरों ने, लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई

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कैराना में मशहूर शायर मुजफ्फर रज्मी की 10वीं पुण्यतिथि पर कुरान ख्वानी कर उनकी मगफिरत के लिए दुआ क? - फोटो : SHAMLI
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मशहूर शायर मुजफ्फर रज्मी को दसवीं बरसी पर किया गया याद
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संवाद न्यूज एजेंसी
कैराना (शामली)। शायरी की दुनिया में देश-विदेश में नाम रोशन करने वाले मशहूर शायर मुजफ्फर रज्मी की 10वीं पुण्यतिथि पर उनके परिजनों ने कुरानख्वानी कर उनकी मगफिरत के लिए दुआएं कराईं।
दानवीर कर्ण की नगरी कैराना का संगीत एवं शायरी की दुनिया में नाम रहा है। यहां के नामचीन शायर मुजफ्फर रज्मी का जन्म मोहल्ला बेगमपुरा में 5 जून 1935 को हुआ था। 19 सितंबर 2012 को मशहूर शायर दुनिया को अलविदा कह गए थे। 72 साल की उम्र में मुजफ्फर रज्मी ने शायरी की दुनिया में देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक नाम कमाया है। उनकी शायरी व गजलें आज भी भारत की लोकसभा व विधानसभा की कार्रवाई और नेशनल मीडिया डिबेट में सत्ता पक्ष व विपक्ष के नेताओं द्वारा सुनाई जाती हैं।
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रज्मी अब इस दुनिया में तो नहीं हैं, लेकिन उनकी शायरी आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। सोमवार को मोहल्ला इकबालपूरा स्थित उनके आवास पर शायर के तीनों बेटों जावेद इकबाल, परवेज जमाल व नवेद कमाल ने उनकी दसवीं बरसी पर मदरसे के बच्चों से कुरानख्वानी कराई। उनकी मगफिरत के लिए दुआएं कराई गई। बड़े बेटे जावेद इकबाल ने बताया कि उनके पिता मशहूर शायर मुजफ्फर रज्मी ने कई प्रसिद्ध शेरों को अपने फानी अंदाज में सुनाकर अमर कर दिया।
उनके कुछ शेर ये हैं ये जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने, लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई। करीब आओ तो शायद समझ में आ जाए के फासले तो गलतफहमियां बढ़ाते हैं। जब भी ऐ दोस्त तेरी तरफ हाथ बढ़ाता हूं कदम फासले भी मेरे हमराह चले आते हैं। गवाही दुश्मनों की थी हमारे सुलहनामे पर आईनों से कभी चेहरों का अंदाजा नहीं होता। हर एक सितम मिटा दो नई सदी के लिए दिलों में प्यार जगा दो नई सदी के लिए।
विदेशों में भी बजाया शायरी का डंका
रज्मी साहब के बेटे नवेद कमाल ने बताया कि 2010 में भारत सरकार की तरफ से सऊदी अरब में सात शायरों को भेजा गया था। उनमें से एक मुजफ्फर रज्मी भी थे। वहां के एंबेसडर ने उनको सम्मानित किया था
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परिवार जी रहा मुफलिसी की जिंदगी
विदेशों तक शायरी की धाक जमाने वाले मरहूम मुजफ्फर रज्मी ने कैराना को खासी पहचान दिलाई है। रज्मी के दिल में टीस थी कि किराए के आशियाने की शायरी के जरिए उनका दर्द भी छलकता था, लेकिन विडंबना है कि परिवार को आज भी अपना आशियाना नसीब नहीं हो सका।

शामली के कस्बा कैराना के मशहूर शायर मुजफ्फर रज्मी की फाइल फोटो।- फोटो : SHAMLI

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