कांधला शाकुंभरी देवी भवन का फोटो
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कांधला। महाभारत कालीन सिद्ध पीठ श्री शाकंभरी देवी भवन मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि महाभारत काल में कर्ण ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। नवरात्र के नौ दिनों तक मंदिर में विशेष पूजा की जाती है।
मंदिर के पुजारी प्रदीप कुमार बताते हैं कि कांधला में कर्ण का द्वार था और कैराना तक उनकी सेना रुकी थी। कांधला को कर्ण का द्वार भी कहा जाता था। पूर्वजों के द्वारा बताया जाता रहा है कि मंदिर के नीचे से होती हुई हरियाणा के कुरुक्षेत्र तक सुरंग बनाई गई थी, जिसके अवशेष भी पुराने मकानों में खोदाई के दौरान कहीं-कहीं मिलते रहते हैं।
प्राचीन मंदिर में कलाकृतियां चूने से बनी हैं तथा एक पत्थर पर तीनों देवियों की प्रतिमा विराजमान है। प्रतिवर्ष शाकंभरी देवी सहारनपुर से ज्योति यहां लाई जाती है। यहां पर नवरात्रि के अष्टमी को दोनों बहनों का मिलन होता है। शोभायात्रा निकाली जाती है।
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नित्य होती है पूजा-आरती और कीर्तन
कांधला। मंदिर में प्रतिदिन सुबह पूजा, आरती के पश्चात भोग लगाया जाता है तथा दोपहर में महिलाएं कीर्तन करती हैं। शाम को फिर उसी प्रकार पूजा आरती और रात्रि में दूध के बाद विश्राम कराया जाता है। नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। कलश स्थापना के प्रतिदिन देवियों की पूजा होती है। वर्तमान में मंदिर के मुख्य संरक्षक श्री निरंजनी अखाड़ा पंचायती हरिद्वार के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरी महाराज हैं। ट्रस्ट अध्यक्ष राष्ट्रीय ब्राह्मण युवजन सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष आशुतोष पांडेय हैं।