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शुगर बाउल में गन्ना मूल्य नहीं है चुनावी मुद्दा

Thu, 12 Jan 2017 12:29 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, शामली
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suger mill - फोटो : amar ujala
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शामली। शुगर बाउल में इस बार के विधानसभा चुनाव में गन्ना मूल्य का मुद्दा ही गायब है। घोषित प्रत्याशी और टिकट के दावेदार जनसंपर्क करने में लगे हैं, मगर हर नेता जातीय समीकरणों के सहारे अपनी चुनावी नैया पार लगाने के प्रयास में दिख रहे हैं। 
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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि जाति या धर्म के आधार पर वोट नहीं मांगा जाना चाहिए। इसके बावजूद विधानसभा चुनाव में नेताओं के पास जीतने के लिए कोई ठोस मुद्दा नहीं है। जातीय समीकरणों के आधार पर ही नेता अपना गणित मजबूत करने में लगे हुए हैं। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। पूर्व के चुनावों में भी जातीय गठजोड़ को ही नेता अपनी जीत का आधार बनाते रहे हैं। 

विधानसभा सीटों का ब्यौरा 
-- शामली विधानसभा क्षेत्र : 2011 में शामली जिले का सृजन होने के बाद शामली विधानसभा सीट अस्तित्व में आई। इस सीट पर कुल दो लाख 98 हजार 196 वोटर हैं, जिसमें एक लाख 64 हजार 901 पुरुष और एक लाख 33 हजार 295 महिलाएं हैं। इनमें जिसमें जाट करीब 72 हजार, मुस्लिम करीब 75 हजार, एससी 40 हजार, वैश्य करीब 25 हजार, गुर्जर करीब 20 हजार, ब्राह्मण करीब 20 हजार हैं। शामली शहर के अलावा कस्बा कांधला, नगर पंचायत एलम सहित जाट बाहुल्य और गुर्जर बहुल गांव इस सीट पर जुडे़ हैं। 
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- कारोबारी दृष्टि से शामली का रिम-धुरा उद्योग देशभर में विख्यात है। गन्ना उत्पादन में अग्रणी है। शामली में गोहरनी रोड निवासी किसान जगमेर सिंह को प्रदेश में प्रति हेक्टेयर सर्वाधिक उत्पादन पर सम्मानित भी किया जा चुका है। वहीं, बीमा पॉलिसी का प्रीमियम भरने में भी नंबर वन रहा है। शुगर मिलों द्वारा गन्ना मूल्य का समय पर भुगतान नहीं करना बड़ा मुद्दा है, मगर इस बार के चुनाव में यह मुद्दा नजरअंदाज हो गया है। 

- कैराना विधानसभा क्षेत्र : इस सीट पर कुल 299980 मतदाता हैं, जिनमें एक लाख 63 हजार 493 पुरुष और एक लाख 36 हजार 487 महिलाएं हैं। इनमें सामान्य वोटर करीब 51.95 प्रतिशत, ब्राह्मण करीब 11 हजार, ठाकुर 4800, वैश्य 7000, मुस्लिम 1,24,120, गुर्जर 35 हजार, कश्यप 34 हजार, एससी 36 हजार हैं। आजादी के बाद इस क्षेत्र में कैराना साउथ और कैराना नॉर्थ के नाम से विधानसभा सीट होती थी। बाद में कैराना, कांधला और थानाभवन सीटें बनीं।

शामली जिला बनने के बाद कांधला सीट समाप्त हो गई। उस सीट के कुछ गांव कैराना में जुड़ गए, तो कुछ शामली सीट में जोड़ दिए गए। लोकसभा क्षेत्र भी कैराना ही है, जिससे इस क्षेत्र की महत्ता और बढ़ जाती है। वहीं, 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में जब शामली तहसील को फूंक दिया गया था, तो उसके बाद से जिले में एकमात्र तहसील कैराना ही रही। 2000 के दशक में शामली तहसील का सृजन हुआ था। जुडीशियल मजिस्ट्रेट और न्यायिक मजिस्ट्रेट कैराना में ही बैठते हैं। शायरों की नगरी कैराना के ही अब्दुल करीम खां ने किराना घराना स्थापित किया, जो दुनियाभर में मशहूर है। वहीं, पलायन
प्रकरण से भी कैराना सुर्खियों में रहा। 

- कारोबारिक दृष्टि से कैराना पिछड़ा रहा। कंडेला में इंडस्ट्री एरिया स्थापित, मगर उससे विकास या रोजगार पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा। क्षेत्र के लोगों का मूल पेशा खेती है। यमुना खादर क्षेत्र में धान की पैदावार ज्यादा होती है, तो कैराना क्षेत्र में सब्जी उत्पादन ज्यादा होता है। कैराना विधानसभा क्षेत्र में ऊन शुगर मिल भी है। 

- थानाभवन विधानसभा क्षेत्र : इस सीट पर कुल वोटर 310307 हैं, जिनमें पुरुष एक लाख 70 हजार 654 और एक लाख 39 हजार 653 महिलाएं हैं। इसमें ब्राह्मण करीब 14 हजार, ठाकुर करीब 20 हजार, वैश्य करीब चार हजार, सैनी करीब 21 हजार, मुस्लिम करीब 93 हजार, जाट करीब 42 हजार, एससी करीब 60 हजार, कश्यप करीब 11 हजार हैं। इस सीट पर नगर पंचायत थानाभवन, नगर पंचायत जलालाबाद, नगर पंचायत गढ़ीपुख्ता सहित गांव जुड़े हैं। 

- कारोबारी दृष्टि से थानाभवन क्षेत्र में बजाज हिन्दुस्थान की शुगर मिल है। इसके अलावा कोई बड़ा उपक्रम इस क्षेत्र में नहीं है। थानाभवन और उससे सटे जलालाबाद क्षेत्र में लहसुन और प्याज की खेती बड़े पैमाने पर होती है। 

पिछले चुनावों का ट्रेंड : 
2012 में विधानसभा चुनाव हुआ, तो जिले की कैराना और थानाभवन सीट पर भाजपा ने जीत दर्ज की। कैराना सीट पर मुस्लिम गुर्जर और हिंदू गुर्जर में मुकाबला था, जिसमें हिंदू गुर्जर हुकुम सिंह जीतने में कामयाब हुए। थानाभवन सीट पर रालोद और बसपा के मुस्लिम प्रत्याशी बराबर लड़े, जिससे भाजपा के सुरेश राणा ने 265 वोटों से जीत दर्ज कर ली थी।

शामली सीट पर गुर्जर बनाम जाट चुनाव हुआ, जिसमें सपा के वीरेंद्र सिंह गुर्जर हार गए थे, तो कांग्रेस के पंकज मलिक जीत गए थे। शामली शहर में भाजपा के परंपरागत वोटरों में पंकज मलिक ने सेंध लगा ली थी। 2007, 2002 और 1996 के चुनाव में भी कैराना सीट पर भाजपा के हुकुम सिंह जीते। हर बार उनके मुकाबले पर मुस्लिम गुर्जर प्रत्याशी रहा। इस सीट का चुनाव हिंदू गुर्जर बनाम मुस्लिम गुर्जर के बीच रहा। थानाभवन सीट पर 2007 में रालोद के अब्दुल वारिस विधायक बने, तो 2002 में सपा के किरणपाल कश्यप ने जीत दर्ज की थी। 1996 में भी सपा ने यह सीट जीती थी। सीट पर मुस्लिम- जाट गठजोड़ कामयाब रहा था। 


- पश्चिमी उत्तर प्रदेश संयुक्त उद्योग व्यापार मंडल के प्रदेश अध्यक्ष घनश्यामदास गर्ग का कहना है कि चुनाव के दौरान नेता बड़े बड़े वादे करते हैं, मगर फिर उन्हें भूल जाते हैं। क्षेत्र की जनता को मूलभूत सुविधाएं भी ठीक से नहीं मिल पाती हैं। बिजली, पानी, सड़कों की हालत किसी से छिपी नहीं है, मगर दुर्भाग्य है कि नेता इन्हें मुद्दा नहीं बनाते। 

- बतीसा खाप चौधरी सूरजमल का कहना है कि किसानों की वोट तो हर नेता लेना चाहता है, मगर किसानों की समस्याओं के समाधान पर ध्यान नहीं देते। शुगर मिलें गन्ना मूल्य भुगतान समय पर नहीं करती। बच्चों की पढ़ाई और शादी के खर्च के लिए भी किसानों को समय पर पैसा नहीं मिलता। किसानों की समस्या चुनाव में मुद्दा बनना चाहिए।
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