कैराना। रोजी रोटी के लिए दूसरे प्रदेशों में काम करने वाले लोग अपने घर तो जैसे तैसे चलकर पहुंच गए, लेकिन यहां पर काम न मिलने से बेरोजगार हो गए है। काम की तलाश में रोज घर से निकलते, लेकिन कहीं पर भी रोजगार न मिलने से परेशान है। उनके सामने घर परिवार को चलाने की समस्या बनी हुई है। जनपद में आए प्रवासी कामगारों और श्रमिकों से बातचीत की गई। पेेश हे रिपोर्ट...
किसी भी कंपनी में काम नहीं मिल रहा
गांव झाड़खेड़ी निवासी सागर सैनी ने बताया कि हिमाचल के जिला सोलन के बद्धी में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था। मार्च में लॉकडाउन में कंपनी में काम बंद हो गया तो मजबूर होकर 15 मई को वापस अपने गांव आ गया। सागर ने बताया कि घर में उसके माता पिता व छोटा भाई है। पिता किसान है। वह हिमाचल में बिजली के फिटिंग का सामान बनाने की कंपनी में नौकरी करता था। उसको कंपनी से 10 हजार रुपये प्रति माह मिल जाता था। लॉकडाउन के चलते मार्च की सैलरी तो उसे मिल गई थी, लेकिन बाद में कंपनी बंद हो गई तो उसे सैलरी मिलनी भी बंद हो गई थी। दो माह तक किराये के मकान में रह कर खर्चा किया। सैलरी न मिलने से उसके पास जो पैसे थे वह खत्म हो गए। इसके बाद अपने घर लौटना पड़ा। उसका कहना है कि कंपनी उसको अब शायद ही नौकरी पर रखे, इसलिए वह दूसरी कंपनी में काम की तलाश कर रहा है, लेकिन यहां भी अधिकांश कंपनियों में काम नही मिल रहा है।
समझ नहीं आता अब क्या काम करें
गांव झाड़खेडी निवासी सुमित भी हिमाचल के सोलन में ही एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था। उसने बताया कि उसको हर महीने 12 हजार मिल जाते थे। लॉकडाउन के बाद कंपनी बंद हो गई तो वह वहां किराये के कमरे में रहने लगा। कंपनी बंद होने के बाद सैलरी मिलनी भी बंद हो गई। दो माह तक वह वहां रहा और जैसे तैसे खर्चा चलाया, लेकिन बाद में समस्या आने लगी तो वह 15 मई को वापस अपने गांव आ गया। घर में उसके माता पिता व एक छोटी बहन है, जिसकी शादी भी करनी है। उसको समझ नही आ रहा कि अब कहां और क्या काम करे।
तलाश के बाद भी नहीं मिलता काम
आर्यपुरी देहात बस्ती निवासी जुल्फकार अंसारी दिल्ली के ओखला में फलों की ठेली लगा कर अपने परिवार का पालन पोषण कर रहा था। जुल्फकार के दो छोटे बच्चे व पत्नी आर्यपुरी में ही रहते है। जुल्फकार ने बताया कि दिल्ली में केले की ठेली लगाने से प्रति दिन 500 रुपये तक बचत हो जाती थी जिसमें अपना खर्चा निकालकर वह घर पर बच्चों के लिए रुपये भेज देता था। 22 मार्च को जनता कर्फ्यू के बाद ठेली बंद हो गई तो वह केले के गोदाम में ही रहने लगा। लगातार लॉकडाउन के चलते घर पैसे भी नही भेज सका तथा जो उसके पास थे वह दिल्ली में ही खर्च हो गए। मजबूर होकर वह 12 मई को वापस आ गया। यहां घर में खाने खर्च के लिए कुछ नहीं है। कई लोगों के पास मजदूरी के लिए गया, लेकिन कोई काम नहीं मिला।
झाड़खेड़ी निवासी सागर अपनी मां और भाई के साथ- फोटो : SHAMLI