शामली। समकालीन साहित्यिक संस्था चेतना द्वारा आयोजित काव्य संध्या में आए कवियों ने अपने ओज, श्रृंगार, हास्य और भावपूर्ण काव्य पाठ से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम में राष्ट्रभक्ति से लेकर समाज की संवेदनाओं तक, हर रंग की काव्य धारा बहती रही। कार्यक्रम शहर के एक रेस्टोरेंट में आयोजित किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ संगठन सचिव डॉ. नीलेश वशिष्ठ ने दीप प्रज्वलित कर किया। कवियित्री श्वेता शर्मा ने अपनी कविता जीने की आरज़ू में मरे जा रहे हैं लोग” सुनाकर जीवन के संघर्षों को शब्द दिए। कवि अजीत आर्य ने अखबार की सुर्खियां-सी हैं तुम्हारी आंखें पंक्तियों से सभी का ध्यान खींचा। हास्य कवि अनिल कामचोर उर्फ पोपट ने रूबी रोटी पचती नहीं और हलवा खाने को जी चाहता है” सुनाकर हॉल में ठहाके लगवा दिए।
कवियित्री डॉ. अर्चना शर्मा ने कस लेती है मन के बेलगाम घोड़ों को चरित्र की मजबूती से सुनाकर सभी को भाव-विभोर किया।
हास्य कवि सुनील अरोड़ा ने 27 मई 87 चेतना का उद्गमकार सुनाकर संस्था के इतिहास की याद दिलाई।
कवि प्रीतम सिंह प्रीतम ने भारत मां की अस्मिता पर प्रश्न सह नहीं सकता सुनाकर राष्ट्रभक्ति की ज्वाला जगा दी।
कवि प्रदीप मायूस की पंक्तियां आंखें निकाल लेंगे और खेलेंगे गोटियां, कोई नजर उठाए हिंदुस्तान पर…
सुनकर श्रोताओं में जोश और उत्साह की लहर दौड़ पड़ी।
कवि पवन कुमार पवन ने कल भी जीवित रहना है तो संस्कारों के प्राण बचाओ सुनाकर समाज को संदेश दिया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. विपिन कौशिक ने किया।
इस अवसर पर लाल सिंह लचक, रूचिर गोयल, डॉ. कृष्ण गोपाल, डॉ. मोहनलाल गुप्ता, डॉ. अनिल कुमार रस्तोगी, सरदार प्रमेन्द्र सिंह, संदीप गर्ग, नीरज संगल, मनोज रुहेला, राकेश शर्मा आदि उपस्थित रहे।