शामली। बेशक, कैराना को पलायन प्रकरण ने बदनाम किया है, लेकिन इस कस्बे की एक खासियत यह है कि यहां अगर शरीफ भाई ईद मनाते हैं तो पड़ोस के लाल सिंह भी इसमें शरीक होते हैं। अगर पप्पू दीवाली मनाते हैं तो अकील भी उन्हें मिठाई खिलाते हैं। रविवार को अमर उजाला ने कैराना के ऐसे मोहल्लों का दौरा किया गया जहां हिंदू और मुस्लिम परिवार दशकों से एक साथ रह रहे हैं।
कर्ण नगरी से विख्यात कैराना का अपना इतिहास रहा है। जिसमें यह भी शुमार है कि यहां कभी सांप्रदायिक झगड़ा नहीं हुआ। एक तरफ जहां 2013 में मुजफ्फरनगर और शामली जल रहे थे, कैराना उस वक्त भी शांत था और आज भी है। हालांकि 2014 में हुई व्यापारियों की हत्याओं से यहां कानून व्यवस्था पर जरूर सवालिया निशान लगे, लेकिन घटना के विरोध में हिंदू और मुस्लिमों ने पूरे एक सप्ताह तक सामूहिक रूप से बाजार बंद रखा था। आज जब 346 परिवारों के पलायन की सूची जारी की गई तो राजनीति का माहौल गर्म हो गया। इसको लेकर पूरे देश में बवाल मचा हुआ है, तो कैराना आज भी स्थिर है। यहां के लोग दशकों से एक साथ व्यापार करते आ रहे हैं, तो एक साथ रह भी रहे हैं।
मोहल्ला जोड़वा कुआं पर मेन बाजार में हाजी अशफाक की करीब साठ साल पुराना मेडिकल स्टोर है, इस पर उनका बेटा मोहम्मद अमीन बैठता है, इनका पड़ोसी है कपड़ा व्यापारी गुटनमल, जिनकी दुकान करीब सौ साल पुरानी है।
आज इस दुकान पर उनका पुत्र विनोद बैठता है। अशफाक का परिवार ईद का त्योहार मनाता है तो विनोद शामिल होता है और विनोद दीवाली मनाता है अमीन शामिल होता है। मोहल्ला आलकला में शरीफ का परिवार रहता है, इन्हीं के बराबर में है लालसिंह का घर। सुख हो या फिर दुख सभी एक दूसरे के साथ रहते हैं, मिलकर तीज त्योहार मनाते है।
नगर के भाट्टूवाला कुआं पर हकीम अकील खान पिछले करीब चालीस साल से हिंदुओं के मोहल्ले में रह रहे हैं, उनका कहना है कि यहां इतना प्यार है कि उनके पड़ोसी पप्पू उनका हर काम में साथ देते हैं। इसी तरह जरूरत पड़ने पर अकील खान भी पप्पू के परिवार के साथ खडे़ रहते हैं।