कैराना के मौहल्ला काजी का बाग में घर के अन्दर मशीनो से बुनी जा रही सुती दरी
- फोटो : SHAMLI
कैराना। कस्बे में अंसारी बिरादरी के करीब दो हजार परिवार आज भी कपड़े की बुनाई कर अपनी आजीविका चलाते हैं। मोहल्ला काजी का बाग के हर घर से पावरलूम की आवाज सुनाई देती है। 15 साल पहले तक इन घरों में हथकरघा पर काम होता था, लेकिन अब बिजली से चलने वाली मशीनें लग गईं हैं। यहां तैयार होने वाले कंबल, दुतई, खेस आदि मुजफ्फरनगर और पानीपत के बाजार में थोक में सप्लाई होते हैं।
कस्बे में सबसे अधिक हथकरघा ईदगाह के पास मोहल्ला काजी का बाग में हैं। यहां प्रत्येक घर में सूती कपड़ा बनाने की मशीन की आवाज सुनाई देती है। इन मशीनों से सबसे अधिक सूती मोटे कपड़े के सर्दी में ओढ़ने वाले सफेद रंग के खेस, मोटे पलंग पर बिछाने वाली सफेद दुतई के अलावा कंबल, दरी आदि बनाए जाते हैं। बड़े व्यापारी थोक के भाव में खरीद कर मुजफ्फरनगर और पानीपत के बाजारों में सप्लाई करते हैं। कस्बे के अंसारी बिरादरी के करीब दो हजार परिवारों की आजीविका का साधन सूती कपड़ा बुनना ही है।
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- बचपन से ही अपने घर में कपड़ा बनाने की खड्डी चलती देखते आ रहे हैं। दादा के समय में खड्डी हाथ से चलाई जाती थी लेकिन 15 साल पहले बिजली से चलने वाली छह मशीनों पर कपड़ा बनाने का कार्य किया जाता है। एक सप्ताह में करीब 30 हजार कपड़े बन जाते हैं। छह मजदूरों के अलावा घर के सदस्य भी काम करते हैं। एक कपड़े पर 15 से 20 रुपये की बचत आती है। - नफीस अहमद, मोहल्ला काजी का बाग
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- केवल सूती कपड़ा बनाने की तीन मशीनें हैं। मशीनों पर दिन-रात घर की महिलाएं भी कपड़ा बनाती हैं। कपड़ा बुनने का सूत कैराना के अलावा पानीपत से भी लाना पड़ जाता है, लेकिन अब बिजली महंगी होने से दिक्कत आनी लगी है। - शौकीन
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घर पर बिजली से चलने वाली दो खड्डी हैं। मोटे सूती कपड़े के खेस व दुतई बनाकर मुजफ्फरनगर के व्यापारी को बेचते हैं। लॉकडाउन के कारण चार माह तक खड्डी बंद रहने के कारण परेशानी हुई थी लेकिन अब सब कुछ ठीक हो गया। - इस्लाम, मोहल्ला खैल कला
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- घर पहले हाथ की खड्डियां थीं लेकिन अब आठ पावरलूम चल रही हैं। पानीपत से सूत मंगाया जाता है। मशीनों से सूती मोटा कपड़ा बुनकर मुजफ्फरनगर भेजा जाता है। उनकी बिरादरी के करीब दो हजार से अधिक परिवार यही काम करके परिवार को पेट पालते हैं। - आमिर, मोहल्ला काजी का बाग