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दो दिन से भूखे हैं, नींद भी नहीं आती साहब

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शामली हरियाणा से पैदल चलकर आते मजदूर - फोटो : SHAMLI
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शामली/कैराना/बाबरी/कांधला। सैकड़ों मील का लंबा सफर, टूटा बदन, जेब खाली, पेट भूखा। लॉकडाउन के बाद पलायन कर अपने घरों को लौट रहे दिहाड़ी मजदूरों और कर्मचारियों की हालत बहुत खराब है। अमर उजाला टीम ने जिले की सड़कों पर अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे इन लोगों से बात की। किसी ने कहा जब से चले हैं ना कुछ खाया ना ही पानी पीया है। रास्ते में कुछ खाने को भी नहीं मिला। कोई तो अपनी परेशानी बताते बताते रो पड़ा। पेश है एक रिपोर्ट...
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देहरादून के विकासनगर रोड पर स्थित गांव टिमली निवासी जाहिद ने बताया कि उसके गांव के छह लोग पानीपत के एक बड़े होटल में लॉड्री का काम करते हैं। सात हजार महीना और खाना पीना मिलता है। लॉक डाउन के बाद होटल बंद हो गया। तीन दिन जो घर में था वो खाया। शुक्रवार शाम को घर का राशन भी खत्म हो गया था। उनके मकान मालिकों ने भी निकाल दिया। महीने के आखिरी दिन चल रहे हैं जो जमा था वो भी खत्म हो गया। जेब खाली हो चुकी थी। शनिवार रात को भूखे पेट पानीपत से देहरादून के लिए चल दिए। रात को सिनौली गांव में कुछ देर लेटकर काटी लेकिन भूख के मारे नींद नहीं आई। सुबह चले तो कैराना में कुछ लोगों ने भोजन के पैकेट दिए जब भूख मिटी। लंबा सफर बाकी है पता नहीं घर कब पहुंचेंगे रास्ते में रोटी मिलेगी भी या नहीं।
कासगंज निवासी मोहित शामली में बस अड्डे के निकट अपने मामा मुकेश और भाई सेवाराम सहित 11 लोगों के साथ घर जाने के लिए किसी वाहन की इंतजार में खड़ा था। मोहित ने बताया कि वे पंजाब के पटियाला में छोले कुल्चे का ठेला लगाते थे। एक सप्ताह पहले से काम बंद हो गया। जो पैसे थे, वे खर्च हो गए। काम बंद होने के साथ खाने के लिए भी कुछ नहीं बचा तो उन्होंने घर लौटने का निश्चय किया, लेकिन घर जाने के लिए कोई साधन नहीं मिला तो पैदल ही चल दिए। रास्ते में एक दो जगह थोड़ी बहुत दूर के लिए ट्रैक्टर आदि साधन मिला। बाकी पूरे रास्ते वे भूखे प्यासे पैदल ही यहां तक पहुंचे। हरियाणा से यमुना पुल पार करने के बाद रास्ते में लोगों ने उन्हें खाना खिलाया।
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कन्नौज निवासी सुनील कुमार ने बताया कि वे पटियाला में फेरी लगाकर चूड़ी बेचने का काम करते थे। जब से लॉकडाउन हुआ तो काम बंद हो गया। काम बंद होने पर उनके पास न पैसे बचे और न खाने को राशन बचा। दिनभर की कमाई से वे बाजार से राशन खरीदकर लाते थे और बनाकर खाते थे। जो पैसे बचाए थे वे खाने में खर्च हो गए। अब घर जाने के सिवा उनके पास दूसरा कोई रास्ता नहीं था। साधन न मिलने पर वे दो दिन से पैदल चलकर यहां तक जैसे-तैसे पहुंचे। रास्ते में एक-दो जगह ही खाना मिला, बाकी पूरे रास्ते भूखे पेट ही चलना पड़ा।
मैनपुरी निवासी उदयवीर ने बताया कि वह पंजाब के पटियाला में फेरी लगाकर चूड़ी बेचता था। आठ दिन पहले काम बंद हो गया। खाने को राशन खत्म, जेब में पैसे नहीं बचे। इसलिए घर जाने के शनिवार को अपने साथी विनय के साथ पैदल ही निकल पड़ा। भूखे प्यासे हरियाणा बार्डर पर पहुंचा। यूपी में झिंझाना के पास कुछ लोगों ने उसे भोजन दिया। अब शामली से घर जाने के लिए कोई साधन मिल जाए तो अच्छा वरना पैदल ही चले जाएंगे।
कैराना में अपने 12 साथी श्रमिकों के साथ 650 किमी श्रावस्ती जा रहे शिव प्रसाद ने बताया कि वो सभी पानीपत में चिनाई मजदूरी का काम करते थे। 10 दिन से काम बंद होने के कारण पैसे भी खत्म हो गये। रात करीब तीन बजे वो सभी पानीपत से पैदल चले थे। रास्ते में कुछ नहीं खाया। अभी पैदल ही जा रहे हैं।
फर्रुखाबाद निवासी संजीव व उसका साथी छोटे लाल पैदल शामली की ओर जा रहे थे। संजीव ने बताया कि वो पानीपत में हैंडलूम पर काम करते थे। 10 दिन पहले मालिक ने काम बंद कर दिया था। 10 दिन पानीपत में रहने के कारण सारे पैसे खत्म हो गए। मालिक ने शनिवार को चलते समय 500 रुपये दिए थे। सुबह चार बजे पानीपत से पैदल चले। अभी तक कुछ नहीं खाया।
सहारनपुर निवासी मनोज व उसके 14 साथी पानीपत में गन्ना छिलाई के लिए दिहाड़ी मजदूरी पर गए थे। खाली रहने के कारण मजदूरी में मिले पैसे भी खत्म हो गए। अब वो सभी पैदल सहारनपुर जा रहे हैं। रविवार सुबह सात बजे चले थे। रास्ते में खाने को अभी तक कुछ नहीं मिला।
शामली निवासी पालेखान के साथ चार महिलाएं, दो युवतियां और चार बच्चे पैदल ही शामली की और जाते मिले। पाले खान ने बताया कि पानीपत में 21 मार्च की शादी में गए थे। लॉकडाउन में बसे बंद हो जाने पर आज मजबूरी में पैदल ही घर जा रहे है।
राजेश निवासी लांक ने बताया कि करनाल भट्ठे पर काम करने गया था। लॉकडाउन के चलते प्रशासन ने कार्य पर रोक लगा दी। भट्ठा मालिक ने घर जाने को बोल दिया। वह कल सुबह सात बजे करनाल से पैदल चला था। सहारनपुर में रात को सड़क किनारे बैठते उठते थानाभवन, बाबरी, बुटराड़ा के रास्ते अपने गांव लांक जा रहा हूं। शनिवार सुबह से भूखे प्यासे राजेश को बाबरी पहुंचने पर जिला पंचायत सदस्य अनिल टीनू ने भोजन कराया।
केस नौ
सिसौली निवासी शावेज हरिद्वार की एक कंपनी में नौकरी करता है। लॉकडाउन के चलते कंपनी मालिक ने 14 अप्रैल तक काम पर न आने को बोल दिया। वह शनिवार को 11 बजे हरिद्वार से नहर पटरी और जंगल के रास्ते गोगवान गांव में पहुंचा। गांव निवासी किसान बीर सिंह ने उसे भोजन कराया।
केस 10
कांधला के निकट भारसी मोड़ पर मिले झिंझाना निवासी ओमप्रकाश दिल्ली में जूते बनाने कारखाने में काम करते हैं। लॉकडाउन के बाद से वे अपने घर बच्चों में आने को परेशान थे, लेकिन साधन न होने पर वे पैदल निकल पड़े। सुबह पांच बजे से चलकर कई स्थानों पर जलपान करते हुए वे अब कांधला तक पहुंचे हैं। अब आगे और पैदल चलने की हिम्मत जवाब दे रही है।
केस 11
फोटो संख्या -38
कांधला में भारसी मोड़ पर पहुंचे सोनू निवासी नीमखेड़ी ने बताया कि वह गौरीपुर में कोल्हू पर मजदूरी कर अपनेे परिवार का पालन पोषण कर रहे थे। सोनू की आंखें अपना दर्द बताते हुए नम हो गईं। उन्होंने कहा बच्चों की घर में जब भूखा मरने की नौबत सामने आती दिखाई दी, तो वे पैदल ही अपने घर की ओर चल पड़े। जहां से पैदल आने पर कई तरह की परेशानी भी सामने आई।
केस 12
फोटो संख्या- 40
एलम के निकट झिंझाना निवासी सन्नवर ने बताया कि अपने गांव के कई साथियों के साथ दिल्ली में पेंटर है। लॉकडाउन के बाद से वहां खाने की भी परेशानी सामने आनेे लगी थी। कोई साधन न होने पर अपने घर की ओर पैदल चल दिए। सुबह तीन बजे से पैदल चलते हुए पैरों में छाले और आंखों में आंसू आने लगे हैं। कोई इस बीमारी के डर से कुछ दूरी तक भी लिफ्ट देने को तैयार नहीं है।
केस13
फोटो संख्या-39
एलम में मिले अलीपुर झिंझाना निवासी फैसल गुड़गांव में अपने साथियों के साथ एल्युमीनियम के दरवाजे बनाने का काम करता है। वहां से अपने घर के लिए पैदल निकल पड़े रास्ते में कहीं पर कोई साधन नहीं मिला। अब चलते हुए 17 घंटों से भी ज्यादा हो गया। कई स्थानों पर कैंप में भी जांच के नाम काफी समय रुकना पड़ रहा है। घर जाने पर ही राहत मिलेगी।

शामली में चबुतरे पर लेटे हूये युवक- फोटो : SHAMLI

शामली में थक कर महिला के साथ बैठा युवक- फोटो : SHAMLI

शामली जुगाड वाहन से परिवार को लेकर गुजरता युवक- फोटो : SHAMLI

शामली में पानीपत से पैदल आते मजदूर- फोटो : SHAMLI

शामली में पानीपत से पैदल आते मजदूर- फोटो : SHAMLI

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