शामली। अश्व प्रजाति के पशुओं में ग्लैंडर बीमारी पांव पसार रही है। जिले में छह पशुओं में इस बीमारी की पुष्टि हो चुकी है। पशुपालन, राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र और ब्रुक्स इंडिया के चिकित्सकों की टीम ने चार खच्चर (टट्टू) को जहर का इंजेक्शन देकर मार दिया। इसके बाद टीम ने खच्चरों को गड्ढा खोदकर दफना दिया गया है। इसको लेकर क्षेत्र में अलर्ट भी जारी कर दिया गया है, ताकि यह बीमारी अन्य पशुओं में नहीं फैल पाए।
मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर भूपेंद्र सिंह ने बताया कि छह और 18 अप्रैल को राष्ट्रीय पशु स्वास्थ्य संस्थान बागपत, अश्व अनुसंधान केंद्र लैब हिसार और पशुपालन विभाग की टीम ने झिंझाना क्षेत्र के गांव डेरा लाल सिंह में अश्व प्रजाति के छह टट्टू (खच्चर) का ब्लड सैंपल लिया था। इसके बाद हिसार स्थित प्रयोगशाला में परीक्षण कराया गया, तो जांच रिपोर्ट में उक्त छह पशुओं में ग्लैंडर बीमारी की पुष्टि हुई। इनमें से दो पशुओं की 18 अप्रैल के बाद मौत हो गई थी, जिन्हें ग्रामीणों ने गड्ढा खोदकर दबवा दिया था।
वहीं, बुधवार को राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक डॉक्टर एच सिंघा, राष्ट्रीय पशु स्वास्थ्य संस्थान बागपत के निदेशक डाक्टर प्रवीण मलिक, ब्रुक्स इंडिया के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉक्टर इमरान, ऊन तहसीलदार करम सिंह, पशुपालन विभाग के डॉक्टर निलय कुमार, डॉक्टर अमित कुमार, सतपाल सिंह और गजराज सिंह आदि ने डेरा लाल सिंह पहुंचकर चार खच्चर को बेहोश करने के बाद यूथिनेशिया (दर्द रहित मौत) दी गई। इसके बाद गहरा गड्ढा खोदकर चारों पशुओं को चूना और नमक के साथ दबवा दिया गया।
मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉक्टर भूपेंद्र सिंह ने बताया कि दो पशु सद्दाम के थे, जबकि आबिद और इस्लाम का एक-एक पशु इनमें शामिल था। नियमानुसार पशुपालकों को आर्थिक सहायता दिलाई जाएगी।
पांच किलोमीटर क्षेत्र में लिए जाएंगे सैंपल
भूपेंद्र सिंह ने बताया कि अब इस क्षेत्र में पांच किलोमीटर के दायरे में रहने वाले अश्व प्रजाति के पशुओं के ब्लड सैंपल जांच के लिए हिसार स्थित अश्व अनुसंधान प्रयोगशाला में भिजवाए जाएंगे, ताकि यह बीमारी अन्य पशुओं में फैलने से रोकी जा सके।
खतरनाक है ग्लैंडर बीमारी
ग्लैंडर बीमारी प्रमुख रूप से अश्व प्रजाति के पशुओं जैसे घोड़ा, खच्चर तथा गधे आदि में होती है। गधे में यह रोग सबसे ज्यादा पाया जाता है। गधे दो तीन हफ्ते में मर जाते हैं। घोडे़ में यह एक्यूट और क्रोमिक दोनों फार्म में होता है। यह कुत्ता, बिल्ली और ऊंट को भी संक्रमित कर सकता है। यह रोग जुनोटिक प्रकृति का है, जिस कारण यह मनुष्यों में भी फैल जाता है, जो इसके संपर्क में आते हैं या अस्तबल में रोजाना काम करते हैं।
बीमारी के कारक
यह एक जीवाणुजनित रोग है, जीवाणु-बैक्टीरिया- बर्खोलडेरिया मैलियाई
ऐसे फैलता है यह रोग ----
बीमार पशु के साथ रहने से, बीमार पशु के मुंह, नाक और फोड़ो से निकलने वाले स्राव से। बीमार पशु के साथ चारा पानी खाने से। यह बीमारी पशुओं से मनुष्य में भी फैल सकती है।
बीमारी के लक्षण ----
- तेज बुखार होना, खाना पीना कम कर देना
- नाक से स्राव आना, जो धीरे धीरे गाढ़ा हो जाता है
- सांस लेने में तकलीफ और खांसी धस्का होना
- नाक में छाले होना और खून मिला हुआ गाड़ा स्राव आना
- शरीर पर गांठे/फोडे़ बनना, फोड़े के पक कर फूटने से गाढ़ा स्राव निकलना
बचाव के तरीके ----
- बीमार पशुओं को स्वस्थ पशु से दूर एकांत में रखना चाहिए
- ग्लैंडर से पीड़ित पशु का चारा पानी अलग रखना चाहिए
- पशु को छूने या संपर्क में आने के बाद हाथ एंटीसैप्टिक व साबुन से धोना
- तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क कर पशु के स्वास्थ्य की जांच कराना
- पशु की मृत्यु हो जाने पर गहरे गड्ढे में चूना और नमक डालकर दबाना