झिंझाना। गांव पटनी परतापुर में मंगलवार को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामनारायण सिंह को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। अंतिम यात्रा के दौरान काफी संख्या में लोग शामिल हुए। पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा क्षेत्र के लोगों ने आजादी के नायक को श्रद्धासुमन अर्पित किए।
उनके निधन से परिवार के सदस्यों पर गम का पहाड़ टूट पड़ा। अधिकारियों ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिवार के सदस्यों को ढांढस बंधाया। परिवार को हरसंभव मदद करने का आश्वासन दिया।
गांव पटनी परतापुर निवासी रामनारायण सिंह (108) ने आजाद हिंद फौज में रहकर देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी। देश आजाद होने के बाद से उन्हें आजीवन पेंशन मिल रही थी।
सोमवार को गांव में ही उनका निधन हो गया था। उनके निधन की सूचना मिलते ही आसपास और गांव के लोगों की भीड़ मौके पर एकत्र हो गई थी। हर कोई सेनानी के परिवार के दुख में शामिल होकर उन्हें सांत्वना दी। मंगलवार सुबह नौ बजे राजकीय सम्मान के साथ उनके पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेटकर श्मशान ले जाया गया।
उनका यहां अंतिम संस्कार किया गया। मुखाग्नि उनके बड़े पुत्र बिजेंद्र सिंह ने दी। पुलिसकर्मियों ने गार्ड आफ ऑनर दिया। इसके बाद उपजिलाधिकारी ऊन दुष्यंत मौर्य और सीओ झिंझाना सुनील कुमार त्यागी तथा अन्य अधिकारियों ने उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए। इस दौरान काफी लोगों की भीड़ श्मशान पर मौजूद रही। हर शख्स की नम आंखें थी। लोगों ने कहा कि उनके निधन से क्षेत्र को अपूरर्णीय क्षति हुई है, जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती।
इस मौके पर जिला पंचायत सदस्य डॉक्टर सुधीर चौधरी, सुनील चौधरी, भाजपा नेता बंटी तोमर, सतेंद्र तोमर, डीसेंट स्कूल के प्रबंधक ऋषिपाल सिंह, सेंट आरसी स्कूल के प्रधानाचार्य देवेंद्र तोमर, सुनील बंसल, चौधरी इंद्रजीत सिंह, आजाद लपराना सहित क्षेत्र के सैैकड़ों लोगों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।
नेताजी के कदमों पर चलने की नसीहत
झिंझाना। पटनी परतापुर निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामनारायण सिंह के बेटे बिजेंद्र सिंह ने बताया कि आजाद हिंद फौज में रहते हुए उनके पिता ने जापान, सिंगापुर, फिलीपिंस, र्बोनिया सहित कई देशों की यात्रा नेताजी सुभाषचंद बोस के साथ की थी। उनके साथ सिंगापुर जेल में रहे थे।
आजाद हिंद फौज में शामिल होने के लिए वह परिजनों को बताए बगैर ही चले गए थे, जिसके बाद उन्हें काफी तलाशा भी गया, लेकिन कुछ पता नहीं चलने पर उन्हें मृत मान लिया था। फिर 1952 में वह घर लौट आए थे।
उनके पिता को पहलवानी का शौक था। क्षेत्र में होने वाले दंगल में बढ़चढ़कर हिस्सा लेते थे। इसके अलावा क्षेत्र में गरीब कन्याओं की शादी में गाय दान करते थे। सामाजिक कार्यों में भी बढ़चढ़कर हिस्सा लिया करते थे।
बुजुर्ग होने के कारण उनका गांव में काफी सम्मान हर लोग करते थे। बच्चे भी उनके व्यवहार से काफी खुश रहते थे। गांव के बच्चे अक्सर उनके पास जाकर उनसे शिक्षा ग्रहण करते थे। वह हमेशा ही नेताजी के पदचिह्नों पर चलने की नसीहत देते रहते थे।
उनके प्रेरणा और आदर्शों पर चलकर परिवार के लोग आगे बढ़े। उनकी नसीहत को अपने जीवन में उतारने की कोशिश की जाएगी, जिससे उनका नाम सदैव अमर रहे। उनके निधन से परिवार को हुई अपूरणीय क्षति की भरपाई कभी भी संभव नहीं है। उनकी देशसेवा के सभी लोग कायल रहेंगे। उनका परिवार मूलरूप से बागपत जिले के बड़ौत के गांव बावली निवासी है। हालांकि काफी समय पूर्व यहां पटनी परतापुर में आकर बस गए थे।