बिडौली। हरियाणा सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश से आने वाली धान की खेप पर रोक लगाए जाने के बाद न केवल यूपी के किसानों की नींद उड़ गई है, बल्कि हरियाणा की मंडियों में बैठे आढ़तियों (कमीशन एजेंटों) की भी मुश्किलें बढ़ गई हैं। यह रोक दोनों राज्यों के बीच कृषि व्यापार की जीवंत कड़ी को झकझोर देने वाली साबित हो रही है। धान की बंदिश से जहां किसानों के रोजगार पर वार है। वहीं किसान और आढ़ती दोनों लाचार हैं।
पिछले कई वर्षों से यूपी के किसान अपना धान हरियाणा की मंडियों में बेचते आए हैं, क्योंकि वहां के आढ़ती न केवल उचित दाम पर फसल खरीदते हैं, बल्कि किसानों को एडवांस राशि देकर उनकी आर्थिक जरूरतों को भी पूरा करते हैं। अब जब बॉर्डर सील कर दिए गए हैं तो न किसान अपनी फसल पहुंचा पा रहे हैं और न ही आढ़ती अपने लाखों रुपये वापस ले पा रहे हैं।
आढ़ती सोहनवीर और बलबीर का कहना है, उन्होंने किसानों को एडवांस देकर भरोसे का रिश्ता बनाया था, लेकिन अब अगर फसल मंडी तक नहीं पहुंची तो पैसा डूब जाएगा। इस रोक से दोनों तरफ के व्यापारियों की कमर टूट रही है।
उधर, किसानों का कहना है कि यदि यही हालात रहे तो उन्हें मजबूरी में यूपी के भीतर ही फसल औने-पौने दामों में बेचनी पड़ेगी। इससे अगली फसल के लिए पूंजी जुटाना मुश्किल हो जाएगा। किसान राजवीर और नरेश ने बताया कि बारीक धान की किस्म यूपी के सरकारी केंद्र नहीं खरीदते। हरियाणा की मंडियों में अच्छे भाव मिलते हैं, लेकिन अब वहां तक पहुंच ही बंद हो गई है।
बृहस्पतिवार को भी हरियाणा सरकार की रोक जारी रही। मंगलौरा पुलिस चौकी के पास बॉर्डर पर ट्रैक्टर-ट्रॉली और ट्रकों की लंबी कतारें लगी रहीं। कई किसानों को रातभर वहीं रुकना पड़ा।
किसान नेता कपिल खाटियान और भाकियू प्रगति के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी अमित मलिक के अनुसार खरीद की सुविधा नहीं होने के कारण यूपी का किसान हरियाणा की निजी मंडियों पर निर्भर है।
जिलाधिकारी अरविंद कुमार का कहना है कि मामले में हरियाणा प्रशासन से बात की जाएगी। प्रयास रहेगा कि किसानों को किसी भी तरह की परेशानी नहीं होने दी जाए।