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फिरंगी हुकूमत के जुल्मों को यादकर सिहर जाते हैं बुजुर्ग

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चरथावल। आजाद भारत में पहली बार लाल किले पर तिरंगा फहरा, तो हर देशवासी की आंखों में खुशी के आंसू थे। हालांकि फिरंगी हुकूमत में देश स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के पराक्रम, शौर्य, साहस को बुजुर्ग याद करते हैं। अंग्रेजों के जुल्म की दास्तां को याद करते ही क्षेत्र के लोग सिहर उठते हैं।
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पहला गणतंत्र दिवस के साक्षी रहे बलवाखेड़ी के 90 वर्षीय हरि सिंह हुक्का गुड़गुड़ाते हुए बताते हैं कि पराधीन भारत में गोरो के जुल्म, महिलाओं पर अत्याचार से आक्रोश पनपा था। गांव से नहर पर बुग्गी पर ब्रिटिश राज में अधिकारी टैक्स लगाते थे। अंग्रेजी हुकूमत में महिलाओं पर बर्बरता और अत्याचार की याद आते ही इसी गांव के 85 वर्षीय महीपाल सिंह की आंखें छलक पड़ती है। बताते हैं कि महिलाओं को घरों में जबरन बंधक बनाया जाता और नौकरी कराई जाती थी। गांवों में महिलाओं से जासूसी कराकर बगावती टोली को गिरफ्तार करने का जुल्म सहना पड़ता था। आजाद भारत में लालकिले पर पहली बार तिरंगा लहराया, तो गांव-गांव में आजादी के तराने गूंजे। गलियों में प्रभात फेरियां निकाली गई। न्यामू गांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे रामनाथ त्यागी के भतीजे 70 वर्षीय राजनपाल बताते हैं कि वह कई बार अपने ताऊ के साथ दिल्ली गए। देश को आजाद कराने में उनके ताऊ ने जेल में रस्सी बांटने का काम किया। कस्बे के शिक्षा प्रेमी 82 वर्षीय ब्रह्मप्रकाश गर्ग कहते हैं कि देश में आजादी की महक से चरथावल के नौजवानों में जोश था। आंदोलनकारियों के यहां जश्न का माहौल था। शिक्षण संस्थाओं में शान से तिरंगा फहराया गया था।
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