शामली। बरसात का सीजन चल रहा है। कच्चे और बेहद पुराने जर्जर भवनों के गिरने का खतरा रहता है। बावजूद इसके प्रशासन अपनी तरह से ऐसी कोई सूची नहीं बनवा सका कि जिले में कितने भवन जर्जर और खस्ताहाल है, जिनके गिरने की आशंका है।
चिंता इसलिए है, क्योंकि बरसात के दिनों में विभिन्न जिलों में मकान गिरने पर लोगों के हताहत होने की घटनाएं होती हैं। पिछले दिनों बिजनौर और बागपत में ऐसे हादसे हो चुके हैं। बीते वर्षों में शामली जिले में भी ऐसे हादसे हुए। इस सीजन में तीन दिन पूर्व ही जलालाबाद क्षेत्र में मकान गिरने से परिवार के तीन लोग घायल हुए। हथछोया गांव में दो मकान गिर गए।
शामली जिले के कैराना, कांधला, थानाभवन, झिंझाना, ऊन, चौसाना भी ऐसे कस्बे हैं, जहां पर सैकड़ों साल पुराने भवन हैं। कोई 80 साल पुराना है, तो कोई 100 साल से ज्यादा पुराना। भवनों की एक मियाद होती है, जब तक वह सही रह सकते हैं। उसके बाद इनके गिरने की आशंका पैदा हो जाती है। खास बात यह है कि जिला प्रशासन के पास ऐसी कोई सूची ही नहीं है कि कितने भवन अपनी निर्धारित समय सीमा पार कर चुके हैं तथा जर्जर हालत में हैं। उन्हें चिह्नित कर जर्जर घोषित किया जा सके।
कच्चे मकानों में रहने को मजबूर
जिले के कई गांव ऐसे हैं, जहां पर बड़ी संख्या में लोग कच्चे मकानों में निवास करते हैं। ऊन क्षेत्र के गांव खोड़समा, भड़ी, जिजौला, कमालपुर, बसी चुंधियारी, कैराना क्षेत्र के गांव मंडावर, बसेडा, बल्हेडा तथा झिंझाना क्षेत्र में भी कई गांव हैं। अकेले खोड़समा में ही करीब 50 कच्चे मकान हैं। इनमें निवास करने वाले लोग अक्सर अफसरों से गुहार लगाते हैं। मगर आज तक इस ओर किसी भी अधिकारी ने कोई ध्यान नहीं दिया। इसके बाद भी प्रधानमंत्री आवास योजना अथवा अन्य किसी योजना के तहत इनके पक्के मकान नहीं बन सके।
जनप्रतिनिधि भी नहीं देते काेई ध्यान
कच्चे मकानों में रहने वाले लोगों की पीड़ा है कि चुनाव के समय वोट मांगने आने वाले नेता वादे और दावे करके जाते हैं कि ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान किया जाएगा। गांव खोड़समा के सोमपाल, कल्लू, रिजवान, संदीप, बिंदर, महक सिंह आदि लोगों का कहना है कि चुनाव में तो नेता पक्के आवास बनवाने का भरोसा देकर जाते हैं, मगर चुनाव समाप्त होने के बाद कोई देखने नहीं जाता। समस्या को लेकर अगर उनके पास जाते हैं तो भी कोई सुनवाई नहीं होती।