शामली। जैन मुनि 108 विव्रत सागर महाराज ने कहा कि सच्चा आनंद इंद्रिय सुख में नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान और कर्मों से मुक्ति में है, इसलिए मोक्ष प्राप्ति के लिए व्यक्ति को धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए।
दिगंबर जैन धर्मशाला में शनिवार को प्रवचन करते हुए जैन मुनि ने कहा कि आसक्ति से मृत्यु दुखदायी होती है, जबकि अनासक्ति से शांतिपूर्ण। मनुष्य अनादि काल से आनंद की तलाश में है, विभिन्न इंद्रियों के माध्यम से इसे प्राप्त करने का प्रयास करता रहा है, लेकिन इंद्रिय सुख क्षणभंगुर है और अंततः दुख की ओर ले जाता है।
जो जीव भेद-विज्ञान और सम्यक दर्शन के साथ रहते हैं, उनके लिए मृत्यु सहज होती है। जैसी मति, वैसी गति के बारे में बताया कि जब जीव अपनी वर्तमान आयु के एक-तिहाई भाग में अपनी अगली आयु (गति) का बंध करता है। एक बार गति का बंध हो जाने पर अंत समय में जीव की बुद्धि उसी गति के अनुरूप हो जाती है, भले ही उसने बाद में धर्म का आचरण किया हो। उन्होंने कहा कि बाहरी व्यक्ति या परिस्थितियां दुख का कारण नहीं होतीं, बल्कि अपने स्वयं के किए हुए कर्म ही दुख देते हैं।
जैन मुनि ने बताया कि विवाह विधि एक पवित्र और आध्यात्मिक पद्धति है, न कि केवल भोग की विधि। इसका उद्देश्य पति-पत्नी को एक-दूसरे को धर्म के मार्ग पर चलने और आध्यात्मिक प्रगति में सहायता करना है, न कि केवल शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति।
कार्यक्रम में चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन आलोक जैन, अरुण जैन, पाद प्रक्षालन मनीष जैन, सविता जैन, मुकुल जैन ने, शास्त्र भेंट रिया जैन, लतिका जैन एवं उनकी दादी ने किया। आहारचर्या मोहित जैन, सुनीता जैन, अक्षत जैन परिवार के यहां संपन्न हुई।