बताया गया कि गौमाता करीब एक घंटे तक कांवड़ उठाने नहीं दे रही थीं। कभी वे कांवड़ को सूंघतीं, कभी गौर से देखतीं। श्रद्धालु हतप्रभ भी थे और भावुक भी।
पंडित ने बताया शुभ संकेत
श्रवण भोला ने बताया कि उन्होंने तुरंत गांव के पंडित से संपर्क किया। पंडित ने कहा कि यह कोई साधारण बात नहीं, बल्कि कोई शुभ संकेत हो सकता है। पंडित ने सुझाव दिया कि बरगद या गुल्लर के पेड़ के नीचे से निकलने से पहले दक्षिणा अर्पित करो और गौमाता को हाथ जोड़ो।
श्रद्धालुओं ने जैसे ही दक्षिणा अर्पित की तो गौमाता ने स्वयं रास्ता छोड़ दिया। इस यात्रा में उनके साथ अर्जुन, सूरज, प्रिंस और सुधीर जैसे सहयोगी भी मौजूद थे, जिन्होंने पूरी घटना को अत्यंत आस्था और सम्मान के साथ देखा।