झिंझाना। मेरठ-करनाल हाईवे स्थित गाड़ी वाला चौक के पास बने वृद्ध आश्रम में पनाह लेने वाले बुजुर्गों की दर्दभरी आपबीती रिश्तों की कड़वी हकीकत को बयां कर रही है। कभी जिनके पास भरे-पूरे परिवार, जमीन-जायदाद और अपने घर का सुकून था। बेटों को घरबार सौंपते ही बर्ताव बदल गया। और तो और घर की दहलीज भी छिन गई। अब वृद्ध जिंदगी की आखिरी सांसें आश्रम की चारदीवारी में ले रहे हैं।
52 बीघा ज़मीन नाम होते ही बहू-बेटों ने घर से खदेड़ा
85 वर्षीय कमलेश देवी ने बताया कि पति के जाने के बाद बेटों ने छल से 52 बीघा उपजाऊ भूमि अपने नाम करवा ली। जैसे ही जमीन का मालिकाना हक मिला, अपनों के लहजे बदल गए। हद तो तब हो गई जब पुत्रवधू और बेटों ने उन्हें धक्के देकर घर से बाहर निकाल दिया। तब से आश्रम ही रह रही है।
करीब 19 महीनों से आश्रम में रह रहे 75 वर्षीय नकलीराम ने बताया कि बीमारी ने पत्नी को छीना, फिर जवान बेटे की मौत हो गई। इस दोहरे सदमे के बाद परिवार के अन्य लोगों ने मुंह मोड़ लिया। उन्हें आश्रम की शरण लेनी पड़ी। वे कहते हैं, यहाँ देखभाल तो बहुत अच्छी है पर अपनों की कमी हर पल खलती है।
परिजनों ने बुढ़ापे की दहलीज़ पर हाथ खड़े कर दिए तो मुंडेट के बिशंबर बीते 6 सालों से आश्रम में रह रहे हैं। केलखेड़ा निवासी सतबीर भी साल भर पहले अपनों के तिरस्कार से तंग आकर यहां शरण लिए हुए है। गुगनपुरा के सोहनपाल मजबूरी में आश्रम आए और अब खाली वक्त काटने व दिल बहलाने के लिए आश्रम में ही चौकीदारी का काम करते हैं।
बुढ़ापे में अपनों का साथ छूटा
उम्र के जिस पड़ाव पर बुजुर्गों को अपनों के प्यार, सेवा और सहारे की सबसे ज्यादा दरकार होती है, उसी वक्त उन्हें तिल-तिल मरने के लिए तन्हा छोड़ दिया जाता है।
वृद्ध नकलीराम
वृद्ध नकलीराम
वृद्ध नकलीराम