सब गमगीन है, सबको तेरे जाने का गम है। बारिश हो या धूप, मैंने हर मौसम झेला, मगर तेरे जाने के पहाड़ जैसे दुख के बोझ ने मुझे भी हिला दिया है, क्यों कि आज मेरे ही बगल में तुम्हारा अंतिम संस्कार जो हो रहा है। गम मुझे भी है पर दिखाऊं किसे, कैसे बताऊं अपनी पीड़ा। तेरे बचपन का सारथी रहा हूं मैं। मेरी साखों पर झूलकर तुम बड़े हुए, जवान हुए पर मुझे नहीं भूले। मैंने धूप झेली पर तुम्हें छाया दी, छाया तुमने भी दूसरों के कष्ट दूर करने के रूप में दी, मगर मेरा गम कैसे दूर होगा।
यह पीड़ा है मायापुर फार्म हाउस के उस पेड़ की, जो इंसान की तरफ बोल नहीं सकता, मगर वह साक्षी है हुकुम सिंह के उन हर लम्हों का जो उन्होंने इस पेड़ के नीचे बिताए। दरअसल, मायापुर फार्म हाउस में करीब 200 साल पुराना बड़ का पेड़ है। यह पेड़ तब भी था, जब हुकुम सिंह का जन्म कैराना के आलकला में पैतृक आवास पर हुआ था। उनके पिता मान सिंह खेती करने के लिए मायापुर फार्म पर ही आते थे। पुराने जानकार बताते हैं कि हुकुम सिंह भी बचपन में अपने पिता के साथ जब खेत पर आते थे, तो इसी पेड़ के नीचे खूब खेलते थे। बाद में 12 वीं की पढ़ाई करने के बाद हुुकुम सिंह इलाहाबाद यूनिवर्सिटी चले गए थे, लेकिन उनका मन कैराना क्षेत्र में ही बसा रहता था। यही वजह है कि 2010 में जब हुकुम सिंह की पत्नी रेवती सिंह की मुजफ्फरनगर स्थित आवास पर हत्या कर दी गई थी, तो हुकुम सिंह ने मुजफ्फरनगर का मकान बेच दिया था और मायापुर फार्म पर आकर आशियाना बनाकर रहने लगे थे। इस पेड़ से उनकी जीवन भर की यादें जुड़ी रहीं और मृत्यु उपरांत हुकुम सिंह का अंतिम संस्कार भी उसी बड़ के पेड़ के पास किया गया।