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गन्ना मूल्य पर टिकी किसानों की निगाहें

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अमर उजाला ब्यूरो
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शामली। खूब हंगामे और धरने के बाद जिले की शुगर मिलें तो चालू हो गई हैं, लेकिन गन्ना मूल्य घोषित नहीं होने से किसानों में बेचैनी है। भाकियू ने कहा कि किसानों का 400 रुपये क्विंटल मूल्य का अधिकार बनता है, लेकिन 350 से कम मंजूर नहीं होगा। 30 नवंबर तक पिछले सत्र का बकाया भुगतान ना मिलने पर आंदोलन की भी चेतावनी दी है।
चालू पेराई सत्र में शुगर मिलें चालू कराने को लेकर भाकियू ने खूब हंगामा किया था। किसान कलक्ट्रेट पर डेरा डालकर बैठ गए थे। धरना प्रदर्शनों के बाद जिले की तीनों शुगर मिलें चालू हुई। मिलों ने करीब 20 लाख क्विंटल गन्ने की खरीद भी कर ली है। जिसकी कीमत करोड़ों में है, लेकिन अभी तक किसानों को फूूटी कौड़ी भी भुगतान नहीं हुआ है। नियमानुसार मिलों को 14 दिनों में मिलों को गन्ना भुगतान करना होता है। थानाभवन शुगर मिल एक नवंबर को चल गई थी। ऐसे में उसे चालू हुए तीन सप्ताह हो चुके हैं। शामली और ऊन मिल भी दीवाली के बाद चल गई थीं। दरअसल सरकार ने अभी तक गन्ना मूल्य की घोषणा नहीं की है। इसी वजह से शुगर मिलें भी भुगतान नहीं कर रही। उनकी बात भी जायज है कि जब तक गन्ने का भाव पता नहीं होगा तो भुगतान कैसे करेंगी।
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इसे लेकर भाकियू के भी तीखे तेवर हो रहे हैं। उधर किसानों की नजरें गन्ना मूल्य पर भी है। भाकियू जिलाध्यक्ष मास्टर जावेद ने बताया कि किसानों का हक 400 रुपये क्विंटल बनता है, लेकिन 350 से कम किसी कीमत पर मंजूर नहीं होगा। उधर शुगर मिलें खुलकर तो कुछ नहीं बोल रही लेकिन मिलें इतना भाव देने को तैयार नहीं है। उनका कहना है कि चीनी के मंदे में इतना भाव देना संभव नहीं है। पहले से ही मिलें घाटे में हैं।

क्या हुआ तेरा वादा
शामली। भाकियू जिलाध्यक्ष के अनुसार शुगर मिलें चालू कराने को लेकर कलक्ट्रेट पर हुए धरने के दौरान अफसरों ने पिछले साल का करीब 350 करोड़ बकाया गन्ना मूल्य भुगतान 30 नवंबर तक कराने को कहा था, लेकिन अभी तक इसमें से एक तिहाई भुगतान भी नहीं हुआ है। 30 नवंबर भी नजदीक है। यदि वादे के अनुसार निर्धारित समय में मिलों ने पूरा भुगतान नहीं किया तो भाकियू बड़ा कदम उठाएगी। इसके लिए हाईकमान दो चार दिनों में निर्णय ले सकती है।
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कोट
पिछले सत्र के बकाया गन्ना भुगतान तेजी से कराया जा रहा है। जल्द ही बाकी भुगतान भी कराने की हर संभव कोशिश हो रही है। गन्ना मूल्य निर्धारण शासन स्तर का मामला है। - अनिल भारती, डीसीओ
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