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दंगे का जख्म नहीं भूलते पीड़ित लोग

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दंगे का जख्म नहीं भूल पाते पीड़ित
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शामली। पांच साल पूर्व सात सितंबर को जो हुआ, उसे याद करके आज भी दंगा पीड़ित सिहर जाते हैं। दंगे ने उनका सबकुछ छीन लिया। घर छूट गया, परिवारों को झोपड़ी में रहना पड़ रहा है, जहां लोग सुविधाओं से मोहताज हैं।
दरअसल, 7 सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगा हुआ था, जिसकी आग शामली जनपद तक पहुंची थी। शामली क्षेत्र के गांव लांक, लिसाड़, बहावड़ी आदि गांवों में मार काट मची थी। कई घरों में आग लगा दी गई थी। इसके चलते रातों रात दूसरे समुदाय के लोगों को गांव छोड़ने पड़ गए थे। लांक गांव में आज भी लोगों के मकान खंडहर के रूप में खड़े हैं। वहीं, गांव लिसाढ़ में सिर्फ एक ही परिवार दूसरे समुदाय का रहता है। दंगे के दौरान शामली जिले में 22 लोगों की मौत हुई थी। अधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 217 मकानों को आग लगा दी गई थी, जबकि 24 मकान क्षतिग्रस्त हुए थे। दंगे के बाद तत्कालीन प्रदेश सरकार ने पीड़ितों को पांच पांच लाख रुपये सहायता राशि के दिए थे। उसके बाद दंगा पीड़ितों ने कांधला और कैराना में जाकर शरण ली थी और वहीं पर अब उनके आशियाना बना हुआ है। कांधला में जन्नत कालोनी तो कैराना में भूरा रोड पर नाहिद कालोनी दंगा पीड़ितों के परिवार रहते हैं।
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पांच साल बाद भी नहीं मिला अब्दुल हमीद
मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगे के दौरान शामली के गांव सिंभालका निवासी अब्दुल हमीद लापता हो गया था। अब्दुल हमीद का बेटा शौकत शामली में नेहरू मार्केट में दुकान करता है। शौकत ने बताया कि उसके पिता का आज तक कुछ पता नहीं चल सका। पुलिस भी कोई मदद नहीं कर सकी। मुकदमा दर्ज कराया था, लेकिन मुकदमे में भी अभी कुछ नहीं हो सका है।
सुविधाओं से वंचित दंगा विस्थापित
कांधला। पांच वर्ष बीत जाने के बाद भी पीड़ितों के चेहरे पर दंगे का दंश साफ झलकता है। गांवों से पलायन करके कांधला में आकर शरण लेने वाले पीड़ित आज भी उस मनहूस दिन को याद करके घबरा जाते हैं।
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दंगा भड़कने के बाद हजारों लोग शरण लेने के लिए कांधला पहुंचे थे। गांव लाक, बहावडी, लिसाड, कुटबा कुटबी, फुगाना सहित अन्य कई गांव से आए लोग कांधला में जन्नत कालोनी, इदरीश बेग विहार कालोनी के साथ कई स्थानों पर रह रहे हैं। गाव गांव लिसाड़ निवासी सलामुदीन ने बताया कि आज भी उस दिन को सोचकर आंखों में आंसू आते हैं। कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए दो समुदाय के लोगों के बीच आग लगाने का काम किया था। गांव कुटबा निवासी फरजाना कहती है कि हम लोग जहां पर रहते हैं वहां की हालत इंसानों के रहने लायक नहीं है। लिसाढ़ निवासी सद्दाम कहते हैं कि दंगे के मुकदमों में अब तक न्याय नहीं मिल सका। हमारे पास अपने बच्चों की रोटी के लिए पैसा नहीं था, तो मुकदमे लड़ने के लिए पैसा कहां से लाते। मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। गांव फुगाना निवासी शकीला कहती है कि वो दिन याद कर आज भी रोना आता है। हमको गांव से आने के बाद न रोजगार मिल पाया और न रहने की जगह। जहां पर हम लोगों के परिवार रह रहे हैं, वहां पानी बिजली नहीं है और न सड़कें । खेतों से जानवर आने पर खतरा हमेशा लगा रहता है। सर्पदंश के कारण कॉलोनी में कई लोगों की मौत हो चुकी है। गांव लिसाढ़ निवासी इकबाल कहते हैं कि जनप्रतिनिधि भी उनका हाल जानने चुनाव में ही आते हैं उसके बाद कोई सुनवाई करने वाला नहीं है। आज तक सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।
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