भाजपाई दिग्गज नहीं भांप पाए वोटरों का मूड
शामली। सूबे की भाजपा सरकार ने निकाय चुनाव में प्रत्याशियों की जीत तय करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। यही वजह है कि निकाय चुनाव के लिए भाजपा कई महीने से युवा सम्मेलन, नवमतदाता जागरूकता अभियान चलाए। इसके बावजूद परिणाम भाजपा के पक्ष में नहीं आया। इसकी मुख्य वजह सामने आ रही है कि भाजपाई मतदाताओं का मूड भांपने में नाकाम रह गए। साथ ही स्थानीय स्तर पर भाजपा के वरिष्ठ नेता और पदाधिकारी सटीक रणनीति बनाने में भी चूक गए। इसका परिणाम भाजपा को निकाय चुनाव में हार के रूप में चुकानी पड़ी। इसके साथ ही विधानसभा चुनाव की तरह लहर की आस लगाए कार्यकर्ता भी अतिउत्साह में डूबे रहे, जिसका खामियाजा भुगतना पड़ गया।
शामली जिले में भाजपा को सिर्फ नगर पंचायत बनत के अध्यक्ष पद पर जीत मिल सकी, जबकि शामली, कांधला, झिंझाना, ऊन और एलम में भाजपा प्रत्याशी कड़े मुकाबले में रहे। इन निकायों में भाजपा प्रत्याशियों के जीतने की उम्मीद खुद भाजपाई लगाए बैठे थे। क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि विधानसभा चुनाव की तरह ही निकाय चुनाव में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी के नाम पर वोट हासिल कर लिया जाएगा। प्रदेश सरकार में गन्ना मंत्री सुरेश राणा, भाजपा सांसद हुकुम सिंह और भाजपा विधायक तेजेंद्र निर्वाल का लाभ भी निकाय चुनाव में भाजपा को नहीं मिल सका। मतदाताओं ने पार्टी के आधार से ज्यादा अपने बीच के चेहरों को पसंद किया। वहीं, इन सीटों पर जीत हासिल करने वाले निर्दलीय प्रत्याशी अपनी सधी हुई रणनीति के तहत चुनाव लड़ते रहे और कामयाब भी हो गए। चर्चा यह भी है कि नोटबंदी के बाद जीएसटी को लेकर खुले तौर पर भाजपा का विरोध तो नहीं था, लेकिन अंदरूनी तौर पर निकाय चुनाव को लेकर मतदाताओं के मन में भाजपा के खिलाफ माहौल बन रहा था। उधर, मुसलिम मतदाताओं ने भी लक्ष्य निर्धारित करके उसी प्रत्याशी को वोट किया, जो भाजपा प्रत्याशी को हराने में समक्ष दिखाई दिया। यह वजह भी भाजपा प्रत्याशियों की हार में कारगर साबित हुआ।
राजेश्वर बंसल कर चुके थे मजबूत तैयारी
नगर पालिका परिषद शामली में अध्यक्ष पद पर जीतने वाली अंजना बंसल के पति पूर्व विधायक राजेश्वर बंसल करीब एक साल से चुनाव की तैयारी में लग गए थे। उन्हें चुनाव में रालोद और कांग्रेस ने समर्थन दे दिया था, जिससे जाट बिरादरी उनके साथ जुड़ गई थी। वहीं, मुसलिम मतदाताओं में भी राजेश्वर बंसल ने अपनी गहरी पैठ बना ली थी। शुरुआत से ही राजेश्वर बंसल को मजबूत माना जा रहा था, लेकिन भाजपाई इस मजबूती की काट निकाल पाने में कामयाब नहीं हो पाए।