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छठ मइया की पूजा कर महिलाओं ने शुरू किया निर्जल व्रत

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शाहजहांपुर। पूर्वांचल की संस्कृति के प्रतीक पर्व छठ पूजा के दूसरे दिन बृहस्पतिवार को कार्तिक शुक्ल पंचमी तिथि में श्रद्धालु महिलाओं ने घरों में ठेकुआ (पूर्वांचल का व्यंजन) बनाने के लिए घरों में गेहूं की पिसाई की और छठ मइया की परपंरागत खरना पूजा की। इसी के साथ महिलाओं ने निर्जल व्रत आरंभ कर दिया। उधर, शुक्रवार शाम खन्नौत तट पर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने के लिए श्रद्धालुओं के लगने वाले मेला को ध्यान मेें रखते हुए वहां नगर निगम ने पर्याप्त रोशनी और पेयजल व्यवस्था के प्रबंध करने शुरू कर दिए हैं। दिन भर नदी तट पर पूजन करने वाले परिवारों के युवक पूजा सामग्री रखने के लिए बालू के मठ बनाने में जुटे रहे।
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वर्ष 1956 से आरंभ हुआ सामूहिक पूजा अनुष्ठान
जनपद मेें पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत बिहार और झारखंड के सैकड़ों परिवार सात-आठ दशक से रह रहे हैं। पहले इन परिवारों की संख्या दो-ढाई हजार तक सीमित थी। बाद में कृभको खाद फैक्टरी कायम होने और एक दशक पहले रिलायंस तापीय परियोजना अस्तित्व में आने पर इन कारखानों में पूर्वांचल के तमाम अधिकारी और कर्मचारी नियुक्त हुए तो उनके परिवार भी यहां आ गए। अब इन परिवारों की संख्या बढ़कर करीब 4500 हो गई है। शुरुआत में पूर्वांचल मूल के परिवार घरों पर ही रहकर पूजा करते थे और नदी के बजाय आसपास के तालाबों में खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे। चूंकि, इस पूजा में बहते जल की धारा में खड़े होकर सूर्यदेव और उनकी बहन छठ माई की उपासना का विधान है। इसलिए वर्ष 1956 में पहली बार पूर्वांचल महासभा के महामंत्री विपुल पाठक की दादी नूनू देवी उर्फ राधिका देवी घरवालों से आग्रह करके खन्नौत तट पर पूजा के लिए कुछ महिलाओं के साथ पहुंचीं। बाद मेें महासभा से जुड़े अन्य परिवार भी सामूहिक पूजा में शामिल होने लगे।
पूजन सामग्री और गन्ना सजाने को बनाए मठ
शुक्रवार को शाम 5:26 बजे डूबते सूरज को व्रती अर्घ्य देंगे। पूजा के अन्य अनुष्ठान संपन्न करने के लिए श्रद्धालु शाम चार बजे से वहां पहुंचने लगेंगे। इसे देखते हुए तमाम परिवारों के युवक सुबह होते ही खन्नौत तट पर जा पहुंचे। उन्होंने फावड़ों के जरिये नदी से रेत निकालकर उससे तट पर जलधारा के बिल्कुल पास में एक से दो वर्ग फिट आकार के मठ बनाने शुरू कर दिए। एक श्रद्धालु परिवार से जुड़े रमेश चंद्र ने बताया कि नदी तट से पूजा का चबूतरा काफी दूर बनाया गया है और पूजा के दौरान बार-बार नदी मेें जाने पर काफी समय लगेगा। इसीलिए नदी तट पर बालू के अस्थायी मठ बनाने पड़ रहे हैं। बताया कि इन्हीं मठों पर पूजन सामग्री के साथ छठ माई का भोग रखा जाएगा और गन्ना सजाए जाएंगे। यही गन्ना छठ माई और भगवान सूर्य को अर्पित किए जाएंगे।
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भीड़ नियंत्रण प्रशासन के लिए होगा चुनौती
शुक्रवार को सामूहिक छह पूजा के लिए जिस तरह की व्यापक तैयारियां हो रही हैं, उन्हें देखते संध्या काल में सूर्यास्त के समय श्रद्धालु परिवारों की भीड़ उमड़नी तय है। हालांकि, पूजा आयोजकों का कहना है कि इस बार कोरोना काल को देखते सभी परिवारों से कहा गया है कि वह अधिक संख्या में समूह के साथ नहीं आएं। केवल निर्जला व्रत रखने वाली महिलाओं को परिवार के एक-दो सदस्यों के साथ आने का सुझाव दिया गया है, लेकिन भीड़ बढ़ने पर उसे नियंत्रित रखने का कोई ठोस तरीका नहीं खोजा गया है। एडीएम प्रशासन रामसेवक द्विवेदी के अनुसार आयोजकों ने ज्यादा भीड़ नहीं होने और पूजा के दौरान सामाजिक दूरी बनाए रखने को आश्वस्त किया है। इसके बावजूद वहां सुरक्षा के लिहाज से तैनात होने वाले पुलिस कर्मचारियों को सामाजिक दूरी का कड़ाई से पालन कराने के निर्देश दिए जा रहे हैं।
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