शाहजहांपुर। रोजा थाना क्षेत्र के गांव हथौड़ा बुजुर्ग स्थित श्रीराम खन्ना एंड कंपनी के भट्ठे पर ईंट पाथने का काम करने वाले मजदूरों ने 31 दिसंबर, 1996 को आटे की बनी रोटी खाईं तो सभी के पेट में ऐंठन और गला सूखने के साथ उल्टी शुरू हो गई। खन्ना के भट्ठे से कुछ दूर एक अन्य भट्ठे के मजदूरों का भी खाना खाने के बाद यही हाल था। दोनों ने सत्यनारायण और राकेश कुमार की किराने की दुकान से आटा खरीदा था। आसपास क्षेत्र के कुछ लोगों ने भी आटे से बनी रोटी खाई थी। करीब 40 लोगों की अचानक से तबियत खराब होने के बाद सभी को अस्पताल में भर्ती कराया गया।
एक जनवरी 1997 की सुबह एक साथ पांच लोगों की मौत के बाद पूरे प्रदेश में हड़कंप मच गया था। एक-एककर 14 लोगों की सांसें थम गईं। इस मामले को लेकर तब खूब विरोध प्रदर्शन हुआ था। जांच हुई, जिसमें आटा मिलावटी होना सामने आया। 25 साल के इंतजार और 42 गवाहों के बयानों के बाद मृतकों के परिजन को इंसाफ मिला। किराना व्यापारियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाते हुए अर्थदंड से दंडित किया गया।
वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप दीपक बताते हैं कि 31 दिसंबर 1996 को शाम करीब पांच बजे भट्ठे पर कार्यरत मजदूरों ने हथौड़ा चौराहा स्थित सत्यनारायण अग्रवाल की किराने की दुकान से आटा खरीदा था। उसे खाने के बाद सरवर व मुंशी की हालत बिगड़ गई। रात में दोनों को अस्पताल में भर्ती कराया गया।
खन्ना के भट्टे के नजदीक सल्लिया भट्ठे पर काम करने वाले आठ से दस मजदूरों ने सत्यनारायण की दुकान से कुछ दूरी पर स्थित राकेश कुमार की दुकान से आटा खरीदकर रोटी बनाकर खाई थी। जिला अस्पताल में मुंशी समेत पांच मजदूरों की मौत हो गई थी। आटा खाने से मजदूरों के अलावा गांव व खंडेलवाल वर्कशॉप के लोग भी बीमार हुए थे। 14 लोगों की मृत्यु हुई थी, उसके बाद भी 25 से 26 लोग अस्पताल में भर्ती थी, जो बाद में स्वस्थ हो गए थे।
ये थे मरने वाले
बदले, मुंशी, केदार, नन्हेलाल, गणेश, राजाराम, नदीम, अंगद सिंह, सिंहासन, रमेश, जलील अहमद, राजेश, नरवीर, लक्ष्मी।
पुलिस जांच में ये तथ्य आए थे सामने
पुलिस जांच में सामने आया कि सत्यनारायण ने हथौड़ा चौराहे पर गल्ला डालने वाले रमाकांत से गेहूं खरीदा था और लोदीपुर निवासी सलीम की आटा चक्की पर गेहूं पिसवाया था। वहीं दूसरे दुकानदार राकेश कुमार ने आटा बेचा था। वह उसने हथौड़ा स्थित शहाबुद्दीन की आटा चक्की पर पिसवाया था। मिलावटी आटा खाकर ही मजदूरों की हालत बिगड़ी थी।
14 लोगों की मौत के बाद चिन्मयानंद धरने पर बैठे थे
मिलावटी आटे की रोटी खाने से 14 लोगों की मौत के बाद पूरे मामले की पड़ताल के लिए जनपद में खूब हो हल्ला हुआ था। मरने वालों में पांच बच्चे भी शामिल थे। उस समय डीएम रहे भगवत प्रसाद मिश्रा की गाड़ी को अस्पताल में लोगों ने घेरकर खूब हंगामा किया था। सांसद रहे चिन्मयानंद तक ने विकास भवन में धरना-प्रदर्शन कर विरोध किया था। इसके बाद तत्कालीन सीएमओ व शासन से आई टीम ने जांच की थी।
15 गवाह टूट गए, नहीं तो आरोपी दोषमुक्त नहीं हो पाते
न्यायालय का सबसे बड़ा हथियार सुबूत और गवाह होते हैं। लेकिन, जब गवाह ही टूट जाएं तो आरोपी को सजा दिला पाना मुश्किल है। ऐसा ही 14 लोगों की मौत के मामले में हुआ। सरकारी वकील अतुल अग्निहोत्री ने केस को पूरी मजबूती से लड़ा। केस डायरी के एक-एक तथ्य को पढ़ने के साथ जिरह की, लेकिन गवाही के समय पीड़ित के अपने ही परिजन टूट गए। जिसके चलते दो आरोपी साक्ष्य के अभाव में बरी हो गए। 25 वर्ष पहले हुए बहुचर्चित कांड में वादी अशोक खन्ना समेत 42 लोगों के बयान दर्ज किए गए। दस्तावेज रूपी साक्ष्य भी कोर्ट के सामने पेश किए गए। पोस्टमार्टम रिपोर्ट, आटे की बोरी, बरामद किया आटा, चक्की से लिया सैंपल आदि न्यायालय के सामने पेश किया गया। एडीजीसी अतुल अग्निहोत्री ने बताया कि कोर्ट में गवाहों का नंबर आया तो मृतकों के अपने करीबी गवाह टूट गए। उनके बयान सही न हो पाने के कारण आरोपी रमाकांत और सलीम को बरी कर दिया गया।
केस के वादी ने कहा-आरोपियों को पहचान नहीं सकता
अभियोजन पक्ष की ओर से वादी अशोक कुमार खन्ना के बयान दर्ज कराए थे। अशोक खन्ना ने आरोपी सत्यनारायन, राकेश, रमाकांत, सलीम व शहाबुद्दीन को घटना से पहले से पहचानने से इनकार कर दिया। वह बोले कि इस समय भी आरोपियों को पहचान नहीं सकता। उनका भट्ठा ग्राम हथौड़ा में है। उनके भट्टे पर काम करने आए लेबर कहां के थे? उन्हें नहीं मालूम है। हथौड़ा चौराहे पर सत्यनारायन अग्रवाल की दुकान थी या नहीं, वह बता नहीं सकते हैं। अभियुक्त रमाकांत व सलीम को लगाए गए आरोप अभियोजन साक्ष्य के अभाव में संदिग्ध होने के कारण दोषमुक्त कर दिया गया। कोर्ट में आरोपियों पर एससीएसटी एक्ट लगाने के साक्ष्य भी नहीं मिले थे।
आरोप पढ़कर सुनाए, अभियुक्त बोले-उन्हें फंसाया गया
न्यायालय में अभियुक्त सत्यनारायण अग्रवाल, राकेश कुमार, शहाबुद्दीन, रमाकांत व सलीम के खिलाफ बहस के बाद आरोप सिद्ध हुए। अभियुक्तों को आरोप पढ़कर सुनाए गए। अभियुक्तों ने बयानों को झूठा और गलत बताया। मुख्य आरोपी किराना व्यापारी सत्यनारायण ने उनकी दुकान से कोई नमूना न लेने व परीक्षण आख्या गलत होने की बात कही। अभियुक्त रमाकांत ने कहा कि वह निर्दोष है। उसने कभी गेहूं बेचने का काम नहीं किया। वह मजदूर है। उसने खन्ना जी के भट्टे पर मजदूरी की। मजदूरी न मिलने पर कहासुनी होने पर उसका नाम फर्जी लिखवा दिया। पुलिस ने अपने उच्च अधिकारियों के दबाव में फर्जी फंसाया है। अभियुक्त राकेश कुमार ने जज के सामने सफाई दी कि उसने केस के वादी खन्ना को अपने खेत की मिट्टी बेची थी। इस बीच उन्होंने ज्यादा मिट्टी की खुदाई कर ली, जिस पर विवाद हो गया था। उसी रंजिश में फंसा दिया गया।
74 वर्षीय व्यक्ति 25 वर्ष से लगातार सहयोग कर रहा
अभियुक्त सत्यनारायण अग्रवाल व राकेश कुमार जमानत पर थे। फैसले के समय अभियुक्त सत्यनारायण अग्रवाल और राकेश कुमार कोर्ट में उपस्थित हुए। सत्यनारायण की ओर से उनके अधिवक्ता ने तर्क दिया कि उनका वादी 74 वर्षीय बुजुर्ग है। 1997 से लगातार न्यायालय में आकर सहयोग कर रहा है। उनके द्वारा आटे में कोई मिलावट नहीं की गई। अधिवक्ता ने कम से कम दंड दिए जाने की प्रार्थना की। वहीं राकेश कुमार के अधिवक्ता ने तर्क किया था कि उनका वादकारी व उसकी पत्नी बीमार है। गेहूं सुरक्षित रखने के उद्देश्य से किसी काश्तकार द्वारा जहरीली दवा रखी होने की संभावना है, जो बाद में विक्रय होने के बाद पिस गई हो। इसलिए उसे कम दंडित किया जाए।
खोखे व दुकान से खरीदा था आटा, रोटी व पूड़ी खाने से बिगड़ी थी तबियत
कोर्ट में विशेष अभियोजक ने तर्क दिया कि मामला गंभीर है। अभियुक्तों ने जान बूझकर अपमिश्रित आटे को खरीदकर ले गए थी। दुकान व खोखे से खरीदे गए आटे की बनीं रोटी व पूड़ी को खाकर उनकी तबियत बिगड़ी। अस्पताल में 14 लोगों की मृत्यु हो गई। साक्ष्य में सामने आया कि रखे गए आटे के बोरों से बदबू आ रही थी।
बाबूराम के बेटे और बेटी की रोटियां खाने से हो गई थी मौत
थाना रोजा क्षेत्र के गांव उदियापुर गांव निवासी बाबूराम की दो वर्षीय बेटी लक्ष्मी व आठ वर्ष के बेटे नरवीर की नए साल के पहले दिन ही रोटियां खने से मौत हो गई थी। पत्रकार कुलदीप दीपक बताते हैं कि अनुसूचित जाति का बाबूराम मेहनत-मजदूरी करता था। उसकी बड़ी बेटी तीन साल पहले गुजर गई थी। उसके बाद दो बच्चों की मौत भी हो गई थी। बताया कि उस समय के डीएम भागवत प्रसद मिश्रा कांड में मरने वालों की संख्या मात्र 12 दर्शाने में अड़े थे। हालांकि, इस कार्ड में 14 लोगों की मौत हुई थी। चिकित्सकों के पैनल ने शवों का पोस्टमार्टम कराने के बाद विसरा प्रिजर्व कर परीक्षण के लिए भेजा था।
एक पत्रावली अलग की गई
-पूरे मुकदमे में शहाबुद्दीन के गैर हाजिर रहने के कारण उसकी पत्रावली अलग कर दी गई। जिसके चलते चार आरोपियों को सजा दी जा सकी।