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Shahjahanpur News: रामगंगा की गोद में पल रहे कछुए, छह हजार को मिला जीवन

Sat, 23 May 2026 04:22 PM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहांपुर
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जलालाबाद के गांव गोरा में स्थापित हैचरी। - फोटो : संवाद
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शाहजहांपुर के जलालाबाद इलाके में कछुओं को बचाने तथा उन्हें संरक्षित करने के लिए वन विभाग की ओर से स्थानीय ग्रामीणों तथा डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया की तकनीकी सहायता से क्षेत्र के गांव गोरा में कछुआ संरक्षण हैचरी संचालित की जा रही है। यहां उचित तापमान पर अंडे रखे जाते हैं और कछुए निकलने के बाद उन्हें सदर रेंज परिसर में बने संरक्षण केंद्र में रखा जाता है। तैरना आने पर कछुओं को रामगंगा नदी में छोड़ दिया जाता है। हैचरी के माध्यम से अब तक करीब छह हजार से ज्यादा कछुओं को जीवन दिया जा चुका है।
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23 मई को विश्व कछुआ दिवस मनाया जाता है। फर्रुखाबाद बरेली हाईवे के किनारे बसे गोरा महुआ गांव से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर रामगंगा नदी के किनारे कटरी के बेहद रेतीले इलाके में लगभग सात साल पहले हैचरी स्थापित की गई थी। वर्तमान में यहां चार सौ से ज्यादा कछुओं के अंडों के संरक्षण का काम चल रहा है।

वन विभाग तथा डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया की तकनीकी टीम ने इस हैचरी की देखभाल का जिम्मा गोरा गांव के रंजीत सिंह को दे रखा है। रंजीत इस गांव के दो बार प्रधान रह चुके हैं। रंजीत और उनका बेटा आंचल कुमार दिन-रात हैचरी की देखरेख में लगे रहते हैं।
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दिल्ली से लगातार होती है मॉनिटरिंग
कछुए जल स्रोतों की स्वच्छता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे जल में मौजूद कई प्रकार के अपशिष्ट पदार्थों को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं। इसलिए कछुओं की संख्या में कमी नदी की पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। दिल्ली से डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की तकनीकी टीम हैचरी को लेकर बराबर सक्रिय रहती है। आंचल ने बताया कि यंत्र से दिन में तीन बार हैचरी का तापमान नापकर वहां भेजा जाता है। कोई गड़बड़ी होने पर वहां से बताए गए उपाय के अनुसार वे लोग कार्य करते हैं।

कड़ी मेहनत से तलाशे जाते है अंडे
मादा कछुआ नवंबर में अंडे देकर उन्हें रेत में दबाने के बाद नदी में चली जाती है। इन अंडों को अक्सर जंगली जानवर निकालकर खा जाते हैं। तकनीकी टीम मशीन से नदी किनारे अल्हागंज से लेकर मिर्जापुर क्षेत्र तक करीब 15 से 20 किमी के दायरे में इन अंडों को तलाशने के बाद उन्हें हैचरी पहुंचाती है। इस काम में ग्रामीण भी सहयोग करते हैं। हैचरी में अंडों को उसी तापमान में रेत के अंदर गाड़कर रखा जाता है। 90 से 95 दिनों में इनमें से छोटे कछुए के बाहर निकलते हैं। यहां रिटफ्ट टर्टल, बाउंड रूपड टर्टल एवं इंडियन टेंट टर्टल प्रजाति के कछुओं के अंडों का संरक्षण किया जा रहा है।

डीएफओ सचिन कुमार ने बताया कि सदर रेंज परिसर में भी इसी प्रकार का संरक्षण केंद्र संचालित है। इसके माध्यम से जागरूकता लाने का प्रयास किया जाएगा। प्रत्येक सप्ताह स्कूली बच्चों और पर्यावरण प्रेमियों को यहां आमंत्रित कर कछुओं के बारे में बताया जाएगा और उनके संरक्षण के लिए प्रेरित किया जाएगा।
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