तीन तलाक के मुद्दे पर भाजपा के कानून लाने की बात से विधानसभा चुनाव पर कोई खास असर पड़ने वाला नहीं है। समाज के लोगों को जागरूक कर तीन तलाक का दुरुपयोग रोका जाना चाहिए। इसमें कानून कुछ नहीं कर सकता। आखिर यह शरीयत से जुड़ा मसला है। यह कहना है मुस्लिम समाज की बुद्धिजीवी महिलाओं का। जीएफ कॉलेज की प्रवक्ता डॉ. अरीब अंजुम कहती हैं कि अधिकांश महिलाएं तीन तलाक पर हस्तक्षेप के खिलाफ ही हैं। ऐसे में कानून लाकर भाजपा उनके वोट हासिल करने की सोच रही है, जो गलत है। कम से कम इस मुद्दे पर तो वोट नहीं दिया जाएगा। पर्सनल लॉ बोर्ड में दखलंदाजी का हक किसी को नहीं है। नेशनल गर्ल्स इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्य आरएन उस्मानी का कहना है कि तीन तलाक की बात जब शरीयत में है तो उसे मानना पड़ेगा। लोग इसका गलत अर्थ निकालने लगते हैं, जो गलत है। किसी भी नियम-कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। तीन तलाक एक साथ देना तो गलत है। भाजपा यदि कानून लाना चाहती है तो लाए, लेकिन इसका चुनाव में कोई नफा-नुकसान नहीं होगा। डॉ. आयशा जेबी का कहना है कि गुस्से में दिया गया तलाक वैसे भी जायज नहीं है। इसे शरीयत में नाजायज ठहराया गया है। तलाक के लिए जो व्यवस्था है, वह एक-एक कर समय के अंतराल में दिया जाए, यह उचित माना गया है, ताकि गलती सुधारी जा सके। इसमें कानून कुछ नहीं कर पाएगा। शमा जैदी कहती हैं कि शिया समुदाय में तीन तलाक का कोई स्थान ही नहीं है। पति चाहे एक नहीं सौ बार तलाक कहता रहे, कोई फर्क नहीं पड़ता। शिया समुदाय इस्लाम को तो मानता है, लेकिन तलाक में विश्वास नहीं रखता। शमा जैदी का कहना है कि पति-पत्नी आपस में प्यार भी करते हैं और झगड़ते भी हैं, ऐसे में तलाक की बात उचित नहीं है। कानून बनने से नई जेनरेशन खुश होगी। चुनाव में इसका क्या असर पड़ेगा। यह नहीं कहा जा सकता।