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रामगंगा का जलस्तर घटते ही भूकटान तेज

Thu, 16 Jul 2015 11:38 PM IST
मिर्जापुर
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बृहस्पतिवार को रामगंगा का जलस्तर घटने से तटवर्ती गांवों में भू-कटान की गति तेज हो गई है। नदी गांव कुनिया और पहरूआ के बीच कृषि भूमि और खेत खलिहानों, बागों को निगलती हुई एकबार फिर हरिहरपुर की आबादी को अपने में समानेे के लिए आगे बढ़ रही है। इससे लोगों ने अपने मकानों को तोड़ना फिर शुरू कर दिया है।
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गांव हरिहरपुर के श्रीपाल व भूमिराज ने बताया कि बुधवार रात से नदी में पानी घटना शुरू हो गया है। नदी के घटते ही भू-कटाव काफी तेज हो गया है। बुधवार रात से बृहस्पतिवार की शाम तक नदी करीब दस-बारह मीटर कटाव कर आबादी की तरफ आ गई है। पिछले कई दिन से कटाव रुक जाने से लोगों ने अपने मकानों को तोड़ना बंद कर दिया था, लेकिन पानी घटने से हो रहे कटाव से फिर मकानों को तोड़कर ईंट आदि निकालना शुरू कर दिया है।
नदी के तटवर्ती गांवों के लोग अपनी निजी संपत्ति को बचाने के लिए दिन रात जुटे हुए हैं, वहीं सरकारी धन को पानी में बहाए जाने की तैयारी हो रही है। हरिहरपुर गांव में बना प्राथमिक स्कूल टेढ़ा अब नदी से बमुश्किल दस-बारह मीटर दूर रह गया है। बावजूद इसके प्राथमिक स्कूल टेढ़ा के नवनिर्मित एकल कक्ष में बृहस्पतिवार को कीमती लोहे का दरवाजा लगवाया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी धन की बर्बादी देखनी हो तो यहां चले आइये। गांव पहरूआ के प्राथमिक स्कूल के दो कमरे नदी में समा चुके हैं, लेकिन शिक्षा विभाग ने स्कूल भवन की सामग्री को बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। इसी तरह टेढ़ा स्कूल भी नदी मे बह जायेगा।  
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इसे कुदरत का करिश्मा ही कहेंगे कि रामगंगा के तटवर्ती गांव मौजमपुर में कई मकान पिछले वर्ष से आधे कटे नदी में लटक रहे हैं, लेकिन इस वर्ष नदी की धारा गांव के किनारे की तरफ से बीच में चले जाने से आबादी के समीप भू-कटाव रुक गया है। नदी गांव के उत्तर तरफ खाली भूमि मे कटाव कर रही है। इसी तरह पहरूआ में पक्का रोड, पीपल का पुराना पेड़ और शिवमंदिर ठोकर की तरह काम करते हुए कटाव को आबादी के समीप रोके हुए है।

रामगंगा के कहर से कटता किसान-बनता ठेकेदार
रामगंगा के तटवर्ती गांव हरिहरपुर में कटते किसान और बनते ठेकेदार वाली कहावत पूरी तरह चरितार्थ हो रही है। नदी के किनारे आ गए बागों को बचाना अब किसानों के बस की बात नहीं रह गई है। किसानों ने नदी में बहने को तैयार हजारों रुपये कीमत के हरे भरे बाग को बेचकर जो मिल जाए उसी पर यकीन कर लिया है। लकड़ी ठेकेदार किसानों की मजबूरी का फायदा उठाते हुए लाखों रुपये के बाग हजारों में खरीदकर मालामाल हो रहे हैं। लोगों का कहना है कि नदी के किनारे ठेकेदार द्वारा बिना परमिट कटवाये जा रहे बागों की कमीशन भी पुलिस और वन विभाग को नहीं देनी पड़ती है।
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