गांव विकास की हकीकत को जानने के लिए प्रदेश के प्रमुख सचिव का संभावित दौरा 16 मार्च को है। इसके लिए यहां के प्राथमिक स्कूलों को दुल्हन की तरह सजाया जा रहा है। कहीं कोई कमी न रह जाए इसलिए डीएम, एसडीएम सहित कई अफसर रोज ही यहां डेरा जमाए हुए हैं।
बता दें कि बुधवार को डीएम शुभ्रा सक्सेना न कुपोषण दूर करने के अपने ड्रीम प्रोजेक्ट संवर्धन सोसायटी द्वारा आंगनबाड़ी केन्द्रों में कराए कार्यों का निरीक्षण कर उसकी प्रगति पर खुशी जाहिर की थी, लेकिन पास ही बने तीन स्कूलों में अध्ययनरत छात्रों की शैक्षिक गुणवत्ता की ओर देखा तक नहीं था।
बृहस्पतिवार को एसडीएम सदर जयनाथ यादव अपने काफिले के साथ करीब तीन बजे यहां के सरकारी स्कूलों में पहुंचे। यहां हो रही रंगाई-पुताई और साफ सफाई को देखने के बाद जूनियर स्कूल में बच्चों के शिक्षा की गुणवत्ता परखने के लिए एक भिन्न का साधारण सवाल किया, जिसका उत्तर कोई छात्र नहीं दे सका। टीचरों को दिशा निर्देश देकर राजस्व कर्मियों और स्थानीय लोगों के साथ एक बैठक कर इलाके की समस्याएं सुनीं और उनके निस्तारण का जल्दी हल निकालने का आश्वासन दिया।
भिन्न का सवाल भी नहीं
बता सके सातवीं के बच्चे
एसडीएम सदर ने अपने निरीक्षण के समय बल्लिया स्कूल के सातवीं कक्षा के छात्रों से भिन्न का सवाल किया तो एक बार पूरे क्लास में सन्नाटा छा गया। किसी भी छात्र ने कोई उत्तर नहीं दिया, जबकि एक अध्यापिका छात्रों को एलसीएम के माध्यम से हल निकालने का हिंट देती रही। एसडीएम ने अध्यापिकाओं को हिदायत दी कि प्रमुख सचिव के आने से पहले बच्चों को साधारण सवालों के जवाब आने चाहिए।
शासन की नीति और
अभिभावक जिम्मेदार
एसडीएम सदर जयनाथ द्वारा बच्चों से पूछे गये सवाल का जवाब न देने पाने का ठीकरा अध्यापिकाओं ने अभिभावकों के ऊपर फोड़ते हुए कहा कि स्कूल से जाने के बाद बच्चे घर पर अभ्यास नहीं करते हैं। उनके अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति उदासीन रहते हैं। बच्चों की शैक्षणिक गुणवत्ता को लिए शासन की नीतियों को भी जिम्मेदार ठहराया है। टीचरों का मत है कि हम बच्चों का मार नहीं सकते, फेल नहीं कर सकते और शिक्षा के प्रति अभिभावकों का सहयोग नहीं मिलता। दिन भर मिड डे मील के चक्कर में कागजों का पेट भरना पड़ता है। ऐसे में उनकी शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रभाव तो पड़ता ही है।