इस सुखद नतीजे के पीछे जल्दी पकने वाली प्रजातियों का रकबा बढ़ना और दिसंबर से लेकर जनवरी के पहले पखवारे में अपेक्षित ठंड न पड़ने को असल वजह बताया जा रहा है। शीघ्र पकने वाली 23 प्रजातियां परिषद की ओर से वर्ष 2015-16 में सूबे के 34.47 फीसदी गन्ना रकबे में किसानों से उगवाई गईं। वर्ष 2011-12 में ऐसी प्रजातियों का रकबा महज 8.9 फीसदी था और वर्ष 2014-15 में 21.35 फीसदी था। परिषद में संकलित गन्ना संबंधी ताजा आंकड़े बताते हैं कि इस बार बरेली मंडल की चीनी मिलों में गन्ने से चीनी की रिकवरी खासी अच्छी रही। मीरगंज मिल में 9.75 फीसदी, बरखेड़ा (पीलीभीत) मिल में 9.90 फीसदी, बहेड़ी मिल में 10.28 फीसदी, पीलीभीत (एलएच) मिल में 10.34 फीसदी, रोजा मिल में 10.60 फीसदी, फरीदपुर में 11 फीसदी, मकसूदांपुर (बंडा) में 11.30 फीसदी और निगोही चीनी मिल में 11.36 फीसदी रिकवरी दर्ज हुई है।
पांच साल में रिकवरी और गन्ना उत्पादन के आंकड़े
वर्ष रिकवरी प्रतिशत गन्ना उत्पादन (टन प्रति हेक्टेयर में)
2011 -12 9.07 59.3
2012-13 9.18 61.63
2013-14 9.26 62.74
2014-15 9.55 65.15
2015-16 10.1 अनुपलब्ध
परिषद से संस्तुत शीघ्र पकने वाली प्रमुख प्रजातियां
को 0238, को 0118, को 98014, यूपी 5125, कोशा 3251, कोशा 8436 और कोशा 8272 दस से 11 माह में पकती हैं जबकि कोशा 767, कोशा 08279, कोशा 08276, कोशा 97264, कोशे 01434 और 08452 करीब 11 से 12 माह में तैयार होती हैं।
1. गन्ने से चीनी की बढ़ी रिकवरी के पीछे सबसे बड़ी वजह किसानों द्वारा शीघ्र पकने वाली प्रजातियों को उगाना है और फसल में लगने वाले रोग के रोकथाम पर खास ध्यान दिया जाना है। सूबे में 34.47 फीसदी गन्ना रकबे में इस बार किसानों ने शीघ्र पकने वाली प्रजातियों को बोया और वर्ष 2016 -17 में इसे बढ़ाकर 50 फीसदी तक किया जा सकता है। शुष्क और कम ठंड वाला मौसम पहले भी रहा है लेकिन गन्ने से चीनी की ऐसी रिकवरी यूपी में पहले कभी नहीं हुई। -- डॉ. बीएल शर्मा, निदेशक, उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद।
2. इस बार गन्ने की लहलहाती फसल और अच्छी मात्रा में चीनी की दर्ज हो रही रिकवरी में मौसमी मिजाज का भी बड़ा योगदान है। दिसंबर से लेकर मध्य जनवरी तक कोहरे, बादल और कड़ाके की ठंड का न पड़ना गन्ने के लिए खासा लाभकारी रहा। न्यूनतम तापमान पांच डिग्री सेल्सियस से अधिकांश दिन ऊपर ही रहा जबकि अधिकतम तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से ऊपर ही रहा। ऐसे में धूप रहने से प्रकाश संश्लेषण जारी रहा जिसके चलते पौधे को भोजन के लिए अपने भीतर के शर्करा को नहीं सोखना पड़ा। -- डॉ. एसपी सिंह, वैज्ञानिक अधिकारी, फिजियोलाजी विभाग, उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद।