शाहजहांपुर। इंसानी हस्तक्षेप के चलते नदियों का पारिस्थितिकी तंत्र बुरी तरह से बिगड़ रहा है। शहर से गुजरने वाली गर्रा और खन्नौत नदियों में प्रदूषण के कारण मछलियों और कछुओं के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है। बगैर शोधन के शहर के सीवर का गंदा पानी और फैक्ट्रियों का केमिकल रूपी गरल पी रहीं नदियों के कोख में पलता जलीय जीवन अस्तित्व के लिए संघर्षरत है।
वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रदूषण, पानी की अनुपलब्धता तथा नम जमीनों के लगातार खात्मे के कारण भारत में जलीय जीवन को खतरा पैदा हो गया है। जुलाजिकल सोसायटी का दावा है कि वर्ष 1980 से अब तक भारत मे तकरीबन 68 प्रतिशत जलीय प्रजातियां पूर्णता विलुप्त हो चुकी हैं। शाहजहांपुर गजेटियर के अध्ययन से पता चलता है कि शाहजहांपुर जिले से गुजरने वालीं रामगंगा, गोमती, गर्रा, खन्नौत आदि में आज से सौ वर्ष पूर्व समृद्ध जलीय जीवन अस्तित्व में था। इनमें मछलियों की अनेक प्रजातियां जैसे सिधाल, बाम, सवल, चीतल पावदा, सिग्गी, बाटा, पनीला, टेंगना, घोघरा, फावना, कछुओं में बतागुर, बतागुर धनका के साथ ही घड़ियाल, मगरमच्छ, दरियाई सर्प अस्तित्व में थे। इनके अतिरिक्त पानी से लगाव रखने वाली अनेक चिड़ियों जैसे इंडियन स्कीमर, ब्लैक विंग, सेलडक, फ्लेमिंगो को नदियों की सतह पर देखा जा सकता था। अब स्थिति विपरीत है। एक शोध के मुताबिक अधिसंख्य प्रजातियां या तो खत्म हो गई हैं या फिर खत्म होने के कगार पर हैं।
नदियों में बढ़ रहे प्रदूषण तथा खनन ने जलीय जीवन के अस्तित्व पर ही प्रश्न लगा दिया है। जिले की अधिकतर नदियां गंगा प्रवाह तंत्र का हिस्सा है। जिले से होकर गुजरने वाली अनेक नदियां रामगंगा तथा अंतत: गंगा में मिल जाती हैं। हालिया अध्ययन में यह बात सामने आई है कि रामगंगा में 47 सप्रिनाइड मछलियों की प्रजाति हैं जो सभी प्रजातियों में 51 प्रतिशत तक हैं। इसके बाद बिगरिड, लेपिओ,मिस्ट्स आदि हैं। इसमें पिछले 20 वर्षों में मछलियों, कछुओं की अनेक प्रजातियां विलुप्त हुई हैं जिनमें फौना मछली, बेरिलियस बोला, बेरिलियस बेंडिलिसिस, तूर प्रमुख हैं।
इनसे है खतरा
किसी भी नदी में जलीय जीवन नदी के स्वास्थ्य का घोतक है। बढ़ते प्रदूषण, शहरी सीवेज, केमिकल्स के प्रवाह, प्रकाश और ऑक्सीजन की अनुपलब्धता के कारण जलीय जीवन पर संकट खड़ा हो गया है। नवंबर से मार्च तक अधिकतर प्रजातियां नदी तट की रेत में अंडे देती हैं जो अवैध खनन और मानव क्रिया से नष्ट हो रहीं हैं।
लॉकडाउन में बहुरे थे दिन
कोरोना के चलते लॉकडाउन के दिनों में पर्यावरण के साथ साथ जलीय जीवन को भी बल मिला था। इन दिनों में गर्रा-खन्नौत नदी तक में पानी की सतह पर मछलियों और कछुओं को देखा गया। रामगंगा में डॉल्फिन की उपस्थिति राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी। रामगंगा नदी शाहजहांपुर जिले की सीमा को बीस किलोमीटर तक स्पर्श करती है। लॉकडाउन खुलने के बाद अब हालात फिर बदल गए हैं।
इसलिए है जलीय जीवों की जरूरत
नदियों में जलीय जीवों की कम संख्या मानव में बीमारी फैलाने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं, रोगाणुओं, प्रोटोजोवा को बढ़ाती हैं। जलीय जीव नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं। ये अपशिष्ट को भोजन बनकर नदियों को साफ रखने में मदद करते है।
2012 में गर्रा में उतराती मिलीं थीं हजारों मृत मछलियां
2012 में शहर से सटी गर्रा में हजारों मृत मछलियां उतरातीं मिलीं जिसे पकड़ने के लिये लोगों का हुजूम नदियों में उतर गया था। बाद में पता चला कि जिले की सीमा के पास उत्तर की ओर बड़ी संख्या में मछलियां पकड़ने के लिए केमिकल डाला गया था। इसी प्रकार 2018 में एक फैक्टरी से निकले शीरे के कारण कन्नौज में लाखों मृत मछलियां मिलीं थीं।
बिसरात पर बन सकता है कछुआ अभ्यारण्य
प्राचीन समय से ही जलीय जीव हमारी आस्था का केंद्र रहे है। भगवान विष्णु के दस अवतारों में एक अवतार मत्स्य और एक कच्छप का भी है। उनके प्रति आराध्य भाव रखकर ही नदियों को स्वस्थ एवं अविरल रखा जा सकता है। शाहजहांपुर के बिसरात घाट में पानी का प्रवाह अच्छा है। यहां पर मत्स्य पालन, कछुओं के संरक्षण पर कार्य किये जाने की जरूरत है। इलाहाबाद में गंगा के पास छोटी-सी ही जगह पर कछुआ अभ्यारण बनाया गया है। इसी प्रकार के अभ्यारण के लिये बिसरात घाट अच्छी जगह हो सकती है। - डॉ. विकास खुराना, अध्यक्ष,पर्यावरण संरक्षण संस्था ‘पृथ्वी’