आर्य समाज के 138वें वार्षिक समारोह के तीसरे दिन भी टाउनहाल में सत्संग हुआ। इसमें स्वयं को श्रेष्ठ सत्मार्ग पर चलने के बारे में बताया गया। इसमें प्रवचन करते हुए आचार्य उर्षबुध ने कहा कि परमात्मा को जीव अनेक स्थितियों में पुकारता है, लेकिन उपासना के लिए पतंजलि निर्दिष्ट योग साधना को ही सर्वोत्कृष्ट माना गया है। कहा कि योग पद्घति का मूल हमे वेदों से ही मिलता है। कहा कि मनुष्य जब अनेक उलझनों और संघर्षों के साथ खुद को सांसारिक झंझटों में घिरा पाता है तो यह स्थिति उसके लिए युद्घ जैसी होती है।
आचार्य ने बताया कि युद्घ केवल अस्त्र और शस्त्रों ने नहीं लड़ा जाता है, मानसिक अंत:द्वंद्वों में भी युद्घ करता है। ऐसी स्थिति में योग की तरह युद्घ में परमात्मा को सहायक के रूप में पुकारने का निर्देश वेद ही देते हैं। बरेली शास्त्री प्रभा ने कहा कि वेदों में यज्ञ शब्द के व्यापक रूप प्राप्त हुए हैं। इसमें देवपूजा, विद्वानों का सत्कार, समाज में संगति एवं सामंजस्य की स्थापना, दान की प्रवृत्ति सहित लोकहित जैसे उच्च भावों का समावेश हुआ है।
पंडित भानुप्रकाश ने भजनोपदेशों के माध्यम से वेदों की शिक्षा के बारे में लोगों को बताया। इससे पहले सुबह ब्रह्मचर्य की पूर्णाहुति हुई। इसमें यजमान के रूप में रामचंद्र सिंघल, रामवीर आर्य, गोपाल, दीपक शामिल हुए। वहीं पूर्णाहुति देने वालों में सुधीर गुप्ता, मीना गुप्ता, गायत्री दीक्षित, सरोज गुप्ता, देवनाथ गुप्ता, चंद्रकांता त्रिवेदी, शिशुराम सिंह, प्रेमचंद्र आर्य, सुरेंद्र सक्सेना, डॉ. जगदीश प्रसाद, राजेश आर्य, सविता बहल, लक्ष्मी देवी आदि मौजूद रहीं।