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परशुराम हैं भगवान विष्णु के षष्ठावतार

Sun, 19 Apr 2015 11:57 PM IST
अशोक द्विवेदी/जलालाबाद।
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धरती से अतातायियों का अंत कर धर्म की स्थापना करने वाले भृगुवंशी भगवान परशुराम का जन्म करीब दस लाख साल पहले बैशाख महीने की अक्षय तृतीया को आज के ही दिन हुआ था। वह भगवान विष्णु के षष्ठावतार माने जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार परशुराम ब्राह्मण होकर भी रौद्र तेज से युक्त, योग, वेद नीति में श्रेष्ठ, दिव्यास्त्रों के संचालन में पारंगत और अवगुणों के घोर विरोधी थे।
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माना जाता है कि जब जमदग्नि ऋषि कोंकण प्रदेश में धर्म प्रचार के लिए आए तो वहां के राजा ने उनकी विद्वता पर मोहित होकर अपनी छोटी पुत्री रेणुका का विवाह उनके साथ कर दिया। इनके पांचवी संतान के रूप में परशुराम ने जन्म लिया। बचपन से वह दृढ़ प्रतिज्ञ, परम आत्मविश्वासी और पितृभक्त थे। उनके युवावस्था काल के दौरान गाधि राज्य में पड़े अकाल से निपटने को हिमालय सं रामगंगा का प्रवाह मोड़कर उसे इस क्षेत्र में लाने वाले भगवान परशुराम ही थे।
बद्रिकाश्रम में उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें शस्त्र और शास्त्र विद्या में पारंगत बनाया। परशुराम ने ऋषि मुनियों पर अत्याचार करने वाले दुष्ट राजाओं का नाश कर धर्म की स्थापना की।
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जलालाबाद है भगवान परशुराम की जन्मस्थली
जनपद की तहसील जलालाबाद जो काफी समय पहले परशुरामपुरी के नाम से जानी जाती थी। इसी धरती पर भगवान परशुराम का जन्म होना न केवल माना जाता है, बल्कि इस अनुश्रुति को प्रमाणिक बनाते कई स्थल और साक्ष्य भी मौजूद हैं। साथ ही कई शोधकर्ताओं ने भी जलालाबाद को ही उनकी जन्मस्थली होना स्वीकारा है। कस्बे के मोहल्ला खेड़ा में स्थित हजारों साल पुराना भगवान परशुराम का मंदिर, पास के ही गांव ढकियाइन में उनकी माता रेणुका देवी का मंदिर और वहीं पर ऋषि जमदग्नि का आश्रम आज भी भगवान परशुराम के गौरवशाली अतीत की गाथा कह रहे हैं। इसके अलावा इस महापुरूष के कार्यों से जुड़े उबरिया, कटका बहादुरपुर और गुनारा आदि गांव भी इस क्षेत्र मे मौजूद है।


मुगल शासन में बदला था नाम
हजारों साल पहले जोगी खेड़ा के नाम से पुकारा जाने वाला यह इलाका बाद में परशुरामपुरी के नाम से मशहूर रहा और कई प्राचीन जगहों पर इसी नाम के शिलालेख भी मिले हैं। इतिहासकारो के अनुसार मुगल शासन के दौरान यहां शासक रहे हाकिम रहमत खां ने अपने मंझले पुत्र जलालुददीन का विवाह करने के बाद इस पूरे इलाके को अपनी पुत्रवधू को मेहर में दे दिया, तभी से ये नगर पहले मेहराबाद और बाद में जलालाबाद के नाम से प्रचलित हो गया। हालांकि इसका नाम पुन: परशुरामपुरी रखे जाने को लेकर कई बार शासन से मांग की जा चुकी है।

परशुराम जयंती पर ये होंगे कार्यक्रम
परशुराम की जन्मस्थली होने का गौरव लिए इस कस्बे में उनकी जयंती बड़े पर्व के रूप मनाने की परंपरा है। भगवान परशुराम जन्म भूमि प्रबंध समिति की ओर से परशुराम मंदिर पर एक सप्ताह तक विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान कराये जा रहे हैं। सोमवार को सैकड़ो भक्तोे द्वारा पूरी नगरी की पैदल परिक्रमा, भगवान परशुराम की शोभायात्रा तथा भंडारे का आयोजन तथा नगर के लोगो की सुख समृद्धि की कामना के लिये रात्रि मे नगरवासी अपने अपने घरो पर दीपक जलाएंगे। इसी दिन मंदिर प्रांगण में मेले का भी आयोजन होगा।
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