रेल महकमे को शहर में बिखरी अरबों की जायदाद से बेपरवाह देख अब पुरानी रेलवे लाइनों की खाली पड़ी जमीन पर इंटरलॉकिंग रोड और खड़ंजे बनाए जाने लगे हैं। जनहित की दुहाई देकर नगरपालिका परिषद और जिले के कुछ माननीय इस तरह के ‘सद्कार्य’ कराने में जुटे हैं। खास यह है कि इसके लिए उत्तर रेलवे से अनुमति लेने की भी जरूरत नहीं समझी गई।
रेलवे स्टेशन से शहर के विभिन्न हिस्सों को जोड़ने वाली करीब साढ़े तीन किमी लंबी दो पुरानी रेलवे लाइनों के इर्द-गिर्द लाखों वर्ग मीटर खाली पड़ी जमीन पर भू माफिया और असरदार लोग लंबे समय से निगाहें गड़ाए हैं। एक लाइन पूर्वी आउटर के खन्नौत फाटक से पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री जितिन प्रसाद के आवास प्रसाद भवन के पीछे, पोस्टमार्टम हाउस होकर बहादुरगंज तक जाती है। इी लाइन से किसी जमाने में बहादुरगंज पॉवर हाउस का रॉ मैटीरियल ढोया गया था। यही नहीं, उस दौरान बहादुरगंज से व्यापारिक माल की अनलोडिंग के लिए इसी ट्रैक पर मालगाड़ी दौड़ती थी।
दूसरी लाइन प्रसाद भवन के पीछे से पुराने बाल संप्रेक्षण गृह, बंका घाट, बिरात और काली मंदिर से होकर भोलागंज के पुराने मालगोदाम को जोड़ती थी। बीती सदी के आठवें दशक के आसपास इन लाइनों का व्यवसायिक इस्तेमाल बंद होने के बाद से यह रेल संपत्ति भू माफियाओं के साथ चोरों और स्मैकियों की निगाह में चढ़ने लगी।
रेल अफसरों ने यह तर्क देकर पुरानी लाइनें उखाड़ने की जरूरत नहीं समझी कि ऐसा करने पर लोग पटरियों तक की जमीन पर कब्जा कर लेंगे। लेकिन हुआ इसका उल्टा। पटरियों का तमाम लोहा-लंगड़ कबाड़ियों के हाथ बिक गया। पोस्टमार्टम हाउस के पीछे से लेकर जेल रोड क्रासिंग तक लाखों की फिश प्लेट चोरी हो गईं। जो लोग पटरियां नहीं उखाड़ पाए, उन्होंने नीचे की मिट्टी खोदकर बेचने का बिजनेस शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि कई जगह पुरानी पटरियां हवा में झूलती नजर आ रही हैं।
बेशकीमती जमीन पर खड़ी हो गईं कालोनियां
बेशकीमती जमीन से अफसरों की बेपरवाही का नतीजा हुआ कि पुरानी लाइनों के दोनों ओर रेलवे द्वारा अधिग्रहीत की गई 25-25 मीटर जमीन को घेरकर वहां कालोनियाें खड़ी कर दी गईं। खन्नौत पुल से इंदिरानगर कालोनी को जोड़ने वाला एप्रोच रोड रेलवे की जमीन पर बना लिया गया। इसी कालोनी के कई बाशिंदों ने रेलवे की जमीन घेर रखी है।
ओवरब्रिज वाली कॉलोनी को जारी हो चुके नोटिस
शहर में टाउनहाल के पुराने ओवरब्रिज से पूर्व दिशा में डाउन लाइन के किनारे सिविल लाइंस कॉलोनी रेलवे की जमीन पर विकसित होकर शहर के नक्शे पर उभर आई। सूत्र बताते हैं कि करीब चार दशक पहले एक ईसाई महिला ने इस क्षेत्र की सैकड़ों वर्ग मीटर रेलवे भूमि का तमाम लोगों के नाम बैनामा कर दिया। मूलत: कोलकाता की रहने वाली इस महिला के विरुद्ध दायर किए गए अदालती वाद मेें फैसला रेलवे के पक्ष में आने के बाद भी कब्जेदारों का कुछ नहीं बिगड़ा।
पुलिस के काम आ रहे पुराने रेल आवास
पुरानी रेल लाइनों के साथ बनाए गए कर्मचारी आवास महकमे के रिकार्ड में भले ही खंडहर घोषित किए जा चुके हों, पुलिस के खूब काम आ रहे हैं। बहादुरगंज बिजली सब स्टेशन के पीछे पुलिस चौकी रेलवे के आवास में ही कायम है। वहीं पर एक ट्रांसपोर्टर भी अपने धंधे में जुटा है। भोलागंज से लकड़ी मंडी और बिसरात होते हुए केरूगंज तक रेलवे जमीन पर अवैध कब्जों की भरमार है। कहीं कूड़ाघर बना है तो कहीं मोटे बोट वाली लकड़ी के ढेर नजर आते हैं।
इन सभी जगह बनाए जा रहे इंटरलॉकिंग रोड
रेल संपत्तियों की सतत अनदेखी होने से अब उनका इस्तेमाल वोट बैंक साधने में भी होने लगा है। पुरानी लाइनों की जमीन पर बन रहे इंटरलॉकिंग रोड और खड़ंजा इसी का नतीजा माने जा रहे हैं। इन मार्गों पर पैसा बहाने में नगरपालिका परिषद और विधायक निधि की समान भागीदारी बताई जा रही है। अब तक जेल रोड से पोस्टमार्टम हाउस तक, बहादुरगंज सब स्टेशन के पीछे से कृष्णानगर, चमकनी में एक मदरसा के पास और बहादुरगंज क्षेत्र की एक साबुन फैक्ट्री के नजदीक कहीं इंटरलॉकिंग तो कहीं खड़ंजा बनाकर रेलवे की जमीन दबा ली गई।
जनता की मांग पर बनवाए गए मार्ग
‘शहर की काफी आबादी रेल लाइनों के आसपास बस गई है। ऐसे लोगों को बरसात के दौरान कीचड़ और जलभराव से निजात दिलाने के लिए पालिका ही नहीं, विधायक निधि का पैसा भी खर्च हो रहा है। रेलवे जब इस जमीन को इस्तेमाल करना चाहेगी, उस वक्त जनहित में बनाए गए रोड हटाए जाने पर पालिका को कोई आपत्ति नहीं होगी।’
-तनवीर खां, चेयरमैन, नगरपालिका परिषद
रेलवे सर्वे रिपोर्ट से जाहिर हुआ अतिक्रमण
‘पुरानी रेलवे लाइनों और भूसंपत्तियों का हाल ही में सर्वे कराया गया जिसमें कई जगह अतिक्रमण पाया गया। सर्वे रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को भेजी जा चुकी है। निष्प्रयोजित रेलवे भूमि प्रदेश सरकार को हस्तांतरित करने को फिलहाल कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। बहुत पहले इस तरह का प्रस्ताव भेजा गया, लेकिन तब राज्य सरकार ने जमीन का रेट बहुत कम आंका।’
-केके शर्मा, सहायक मंडल अभियंता, उत्तर रेलवे