जलालाबाद। महाभारत काल में बने मां काली मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक फैली है। यह अति प्राचीन मंदिर नगर से करीब छह किलोमीटर दूर गांव तिकोला में बहगुल नदी किनारे स्थित है। मान्यता है कि कभी यहां घोर जंगल हुआ करता था, महाभारत के समय अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहां काफी समय गुजारा था। उसी दौरान द्रोपदी ने यहां माता काली की मूर्ति बनाकर उनकी घोर तपस्या की थी।
बताते हैं कि द्रोपदी की तपस्या से प्रसन्न होकर माता काली ने उन्हें न केवल साक्षात दर्शन दिए, बल्कि इच्छित वर के रूप में उन्हें महाभारत के युद्ध में जीत का आशीर्वाद भी दिया था और अर्जुन को दिव्यास्त्र भी प्रदान किए थे। जब पांडवों ने यहां से प्रस्थान किया, तब उन्होंने मिट्टी का मंदिर बनाकर उसमें मां काली की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की थी। कालांतर में मंदिर का स्वरूप बनता बिगड़ता रहा, लेकिन मां काली की मूर्ति जस की तस रही। सैकड़ों वर्ष हो जाने के कारण दीवार में स्थापित यह मूर्ति अब स्पष्ट दिखाई नहीं पड़ती है, परंतु मंदिर भव्य रूप में आज भी मौजूद है।
यहां हर साल आषाढ़ महीने में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पूर्णमासी तक पंद्रह दिन चलने वाली देवी जात मेला के दौरान यहां प्रदेश के विभिन्न जनपदों आने वाले भक्तों की भारी भीड़ जुटती है। इसके अलावा यहां पूरे साल विभिन्न धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठान होते रहते हैं यह मंदिर तिकोला वाली मैया के नाम से ज्यादा प्रख्यात है। माता के इस मंदिर पर कोई पुजारी या महंत नहीं रहता, बल्कि गांव के रहने वाले माली परिवार की बीती कई पीढ़ियां मंदिर में सेवादार के रूप में काम करती चली आ रही हैं। मौजूदा समय यहां नरेश माली माता की सेवा में लगे हुए हैं।
घंटा चढ़ाने की है परंपरा
काली मंदिर के सेवादार नरेश माली बताते हैं कि मंदिर में स्थापित मां काली के प्रति आस्था रखने वाले विभिन्न जनपदों और प्रांतों से भक्त आते रहते हैं और मनौती मांगते हैं। मनौती पूरी होने पर माता को घंटा भेंट करने की परंपरा है। महिला भक्तों की माता पर अटूट श्रद्धा के चलते यहां कई तरह के आयोजन पूरे साल होते रहते हैं।