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भेदक कीटों का वंश ही मिटा देता है ट्राइकोग्रामा

Sat, 29 Aug 2015 11:45 PM IST
शाहजहांपुर।
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पौधों के जड़, तना और फल को भेद कर फसल को बर्बाद करने वाले भेदक कीट से निजात पाने का सस्ता और इकोफ्रेंडली विकल्प कृषि विज्ञानियों ने 20 साल तक के लगातार व्यावहारिक परीक्षण में ढूंढ निकाला है। यह विकल्प ट्राइकोग्रामा नामक परजीवी है। यह महीन चींटी के आकार का होता है, लेकिन रेंगता या चलता नहीं, बल्कि हवा में उड़ता है। महज सात दिन इसकी आयु होती है। ट्राइकोग्रामा अपने जीवन चक्र के दूसरे ही दिन भेदक कीट के अंडों को डंक मारने के अंदाज में भेदकर उसमें अपने शुक्राणु डाल देता है। नतीजा यह कि भेदक कीट के वंश का सूपड़ा साफ और उसके अंडे से उसके नहीं बल्कि इस परजीवी के बच्चे बाहर निकलते हैं।
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रूहेलखंड और आसपास के क्षेत्र में गन्ना जैसे नगदी फसल पर भेदक कीट की मार से किसानों की परेशानी ने उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद को खासे चिंता में डाल दिया था। बंगलुरु स्थित सेंटर फार इंटेग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट से इस परजीवी को आजमाने का सुझाव मिला, तो वर्ष 1990 से इसका परीक्षण परिषद के खेतों और फिर किसानों के खेत में शुरू हुआ। महंगे रासायनिक दवाओं की तुलना में यह काफी किफायती मिला। कागज के जिस एक गत्ते या कार्ड पर इसके 20 हजार अंडे सुषुप्तावस्था में चिपके होते हैं, उसकी कीमत परिषद ने 35 रुपये तय कर रखी है। एक हेक्टेयर खेत में कुल ढाई कार्ड का इस्तेमाल काफी होता है और उसे कुल 10 टुकड़ों में तोड़कर खेत में 10 स्थानों पर समान दूरी पर पौधे के पत्तियों वाले जोड़ पर रखना होता है। दो-तीन दिन में अंडे से परजीवी नवजात रूप में बाहर आते हैं और कुल पांच से छह दिन में खेत से भेदक कीट का नामोनिशान मिट जाता है।
इस परजीवी पर सतत शोध परीक्षण कर रहे परिषद के कीट अनुभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. केपी पांडेय बताते हैं कि गन्ना के अलावा धान, फूलगोभी, पत्तागोभी, बैगन और टमाटर की खेती में इसका परीक्षण समान रूप से सफल पाया गया है। जुलाई से सितंबर माह तक इसका इस्तेमाल सबसे कारगर रहता है। क्षेत्र की चीनी मिलें अपने किसानों में वितरण के लिए सीधे बड़ी मात्रा में इस ट्राइको कार्ड को खरीदने आ रही हैं। इस वर्ष तो खीरी, हरदोई, शाहजहांपुर आदि से करीब ढाई सौ से अधिक किसान अब तक यहां लैब से इस कार्ड को खरीद कर ले जा चुके हैं।
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लैब में ऐसे पनपता है ट्राइकोग्रामा
लैब में चावल को सड़ाया जाता है, इसमें से भूरे रंग की महीन तितली जन्मती है। उसके अंडे को जुटाते हैं। अब आधे मले या दले हुए मक्के के दाने पर डालते हैं तो एक नई प्रजाति और गुरों वाली भूरे रंग की उड़ने वाली महीन चींटी पनपती है। यही ट्राइकोग्रामा है। इसके अंडे को जुटाकर गोंद में लपेटकर सात इंच लंबे और ढाई इंच चौड़े कागज के गत्ते या कार्ड पर रखकर टेस्ट ट्यूब में डालकर सात दिनों तक अलग सहेजकर रख देते हैं। फिर हर अंडे से परजीवी का नया वंश जन्मने से पहले की सुषुप्तावस्था में होता है। इसी कार्ड को किसान के दिया जाता है। एक एकड़ खेत में एक कार्ड काफी होता है और उसे चार टुकड़ों में तोड़कर खेत में समान दूरी पर चार स्थानों पर रखना होता है, ताकि जन्मने के बाद ये खेत में उड़कर अपने पसंदीदा शत्रु भेदक कीट के अंडों की नस्ल बदलने की आक्रामकता के साथ टूट पड़ें।
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