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अंग्रेजों के इशारे पर शुरू हुआ था लाट साहब का जुलूस

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शाहजहांपुर। अपने अनूठे तरीके के लिए चर्चित लाट साहब के जुलूस का इतिहास काफी पुराना है। इसकी शुरुआत अंग्रेजों ने हिंदू-मुस्लिम एकता को खंडित करने के उद्देश्य से कराई थी। अंग्रेजों की शह पर ही तत्कालीन नवाब के अत्याचारों का बदला लेेने के लिए इस जुलूस की शुरुआत हुई। आजादी के बाद इसका नाम बदलकर लाट साहब कर दिया गया। होली के दिन निकलने वाले जुलूस के लिए लाट साहब बनने वाले व्यक्ति की तलाश शुरू कर दी गई है। मगर इस बार माहौल बदला होने के चलते पुलिस प्रशासन ज्यादा सतर्क है। अफसर रास्तों का भ्रमण कर उन्हें दुरुस्त कराने में लगे हैं।
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वर्षों पुरानी परंपरा को निभाने के लिए आयोजकों ने लाट साहब की तलाश शुरू कर दी जाती है। आयोजकों के मुताबिक होली के दिन लाट साहब बने व्यक्ति को बैलगाड़ी पर पड़े तख्त पर कुर्सी के ऊपर बैठाकर जुलूस निकाला जाएगा। परंपरा के अनुसार जुलूस के दौरान हुड़दंगी लाट साहब के सिर पर झाड़ू और जूते मारते चलते हैं इसलिए सुरक्षा के लिहाज से लाट साहब को हेलमेट पहनाया जाता है। भ्रमण के दौरान लाट साहब के ऊपर लोग घरों से रंग-पानी डालते हैं। किसी भी अनहोनी से बचने के लिए जुलूस के साथ भारी संख्या में पुलिस बल चलता है। इसका नेतृत्व सिटी मजिस्ट्रेट करते हैं। इसलिए जुलूस को लेकर पुलिस-प्रशासन और आयोजकों ने तैयारियां शुरू कर दी हैं।
कोर्ट तक पहुंचा मामला
कई बार लाट साहब के जुलूस पर रोक लगाने के लिए कोर्ट की भी शरण ली गई, लेकिन यह मामला अब चूंकि धार्मिक परंपरा के रूप में स्थापित हो चुका है लेकिन कोर्ट से इस पर रोक नहीं लग सकी। हालांकि बीच में कुछ समय तो बाबा विश्वनाथ मंदिर से जुलूस के साथ देव स्वरूपोें की झांकियां भी निकाली गईं, लेकिन बाद में यह परंपरा बंद हो गई।
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लाट साहब का इतिहास
इतिहासकार डॉ. नानक चंद्र मेहरोत्रा के मुताबिक 1857 गदर से पहले हिंदू-मुस्लिम आपसी सद्भाव से सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे। होली पर भी सभी एक साथ रंग खेलते थे। किला पर नवाब साहब से रंग खेलने के लिए हुरियारे जाते थे और नवाब साहब को बाहर बुलाया जाता था। जब नवाब साहब रंग खेलने आते थे, तभी लोग एक-दूसरे को सूचना देने के उद्देश्य से नवाब साहब निकल आए का नारा लगाते थे, यह परंपरा आज भी है, लेकिन अब इसका रूप विकृत हो चुका है। अब सभी जगह हुड़दंगी वही नारा ‘निकलि आए नवाब साब’ लगाते घूमते हैं। गदर के दौरान किला पर नवाब साहब का अत्याचार बढ़ने लगा था और वह हिंदुओं को कर वसूली के लिए प्रताड़ित करने लगेे थे। 1858 में जब अंग्रेजों का पूरी तरह शासन हो गया, तब उन्होंने फूट डालो और राज करो की तर्ज पर हिंदुओं को साधा और नवाब साहब के अत्याचारों का बदला लेने के लिए जुलूस निकालना शुरू किया। यह जुलूस पहले हाथी और ऊंट के साथ निकलता था। वर्ष 1930 में जुलूस के दौरान मिशन स्कूल मार्ग स्थित इमामबाड़ा के पास किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया, इसलिए लोगों ने तत्कालीन डीएम से कहा कि उनके घर की दीवारें नीची हैं, जिस कारण बेेपर्दगी होती है। उसके बाद यह जुलूस बैलगाड़ी पर निकलना शुरू हो गया, जो आज भी बदस्तूर जारी है।
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