शाहजहांपुर। होली पर हर साल निकलने वाले लाट साहब के जुलूस को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं। आयोजकों के अनुसार लाट साहब इस बार दिल्ली से आएंगे। उनको जुलूस के दौरान जूते- चप्पल का वार झेलने के लिए 5100 रुपए नेग में दिए जाएंगे। इसके साथ ही कपड़े और शराब भी मिलेगी।
शहर में होली पर निकलने वाले लाट साहब के जुलूस की चर्चा दूर-दूर तक है। इस जुलूस की शुरुआत अंग्रेजों के शासन काल से शुरू हुई थी। तब गधे पर लाट साहब को बैठाकर रंग खेलते हुए शहर में घुमाया जाता था, फिर उन्हें हाथी पर बैठाकर घुमाया जाने लगा। अब लाट साहब को भैंसा गाड़ी पर बैठा कर शहर का चक्कर लगवाया जाता है। इससे पहले लाट साहब की जमकर खातिरदारी होती है।
यानि जो व्यक्ति लाट साहब की कुर्सी पर बैठता है, उसको कई दिन पहले से खिलाना-पिलाना शुरू हो जाता है। इसके साथ ही होली के जुलूस के बाद रुपये, कपड़े और मिठाइयां उपहार स्वरूप दी जाती हैं।
जुलूस के आयोजक व पूर्व सभासद हरनाम कटियार के मुताबिक, अबकी बार लाट साहब की कुर्सी पर बैठने वाला व्यक्ति दिल्ली से आएगा। जिसको 5100 रुपए, कपड़े और मिठाई के साथ शराब की बोतल भी दी जाएगी। जोकि एक परंपरा है और वर्षों से चली आ रही है। उन्होंने बताया कि लाट साहब को ढूंढ लिया गया है और 170 रुपये बयाना के तौर पर दिए जा चुके हैं। लाट साहब बनने वाले व्यक्ति की खातिरदारी में भी कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी।
बेहद संवेदनशील माना जाता लाट साहब का जुलूस, तिरपाल से ढके जाते धार्मिक स्थल
शाहजहांपुर में होली पर निकलने वाला लाट साहब का जुलूस बेहद संवेदनशील माना जाता है। इस कारण कुछ धार्मिक स्थलों को तिरपालों से ढक दिया जाता है। गलियों में बैरिकेडिंग कर दी जाती है। बड़ी संख्या में फोर्स बाहर से बुलाया जाता है, तब कहीं जुलूस शांतिपूर्वक संपंन्न हो पाता है। शाहजहांपुर में होली का जुलूस जिला प्रशासन और पुलिस की सबसे बड़ी परीक्षा होती है।
ब्रिटिश काल में हुई थी लाट साहब जुलूस की शुरुआत
लाट साहब का जुलूस निकालने की शुरुआत ब्रिटिश काल में हुई थी। जानकार बताते हैं कि शहर के नवाब के खिलाफ विद्रोह की साजिश रची गई थी, तब नवाब को कुछ समय के लिए शाहजहांपुर छोड़ना पड़ा था। इसके बाद जब सबकुछ ठीक हो गया, नवाब वापस आए तब लोगों ने खुशियां मनाईं। तब नवाब साहब बैलगाड़ियों में पकवान, मिठाइयां लेकर शहर में निकले थे, सभी को पकवान और मिठाइयां बांटी गईं थीं। इसके बाद नवाब समर्थकों ने धीरे-धीरे जुलूस की परंपरा ही डाल दी।
बाद में गधे पर लाट साहब बनाकर एक व्यक्ति को बैठा कर पूरे शहर में जुलूस की शक्ल में घुमाया जाने लगा। लाट साहब को गधे पर बैठाने के पीछे नवाब समर्थकों का अपने गुस्से को इजहार करना बताया जाता है, क्योंकि नवाब के खिलाफ विद्रोह हुआ था, इसलिए गुस्से का इजहार करने के लिए हर साल जुलूस निकाला जाने लगा। जिस पर अंग्रेजों ने पाबंदी भी लगाई थी, लेकिन बाद में फिर से लाट साहब की सवारी निकलना शुरू हो गई। फिर यह जुलूस होली पर निकाला जाने लगा।
छोटे लाट साहब का भी निकलता है जुलूस
शहर के चौक क्षेत्र से निकलने वाले लाट साहब के अलावा सहायकाइयां से भी होली वाले दिन जुलूस निकलता है। जिसको छोटे लाट साहब का जुलूस कहा जाता है। यह जुलूस सराइकाइयां, रेती इलाके से होकर गुजरता है। शाहजहांपुर के प्रतिष्ठित समाजसेवी अपनी जिम्मेदारी को निभाकर जुलूस शांतिपूर्वक संपंन्न कराते हैं।
कोतवाली में इंस्पेक्टर देते हैं लाट साहब को सलामी
लाट साहब का जुलूस शहर के चौक स्थित फूलमती मंदिर से शुरू होता है। बैलगाड़ी पर लाट साहब को बैठाकर चौक कोतवाली ले जाया जाता है, जहां पर कोतवाल लाट साहब को सलामी और उपहार देते हैं। इसके बाद कच्चा कटरा, इस्लामियां कॉलेज, सदर बाजार होते हुए बाबा विश्वनाथ मंदिर जुलूस पहुंचता है, जहां पर देव प्रतिमाओं के सामने लॉट साहब माथा टेकते हैं, फिर यह जुलूस पंखी होटल, सदर चौराहा, घंटाघर, कच्चा कटरा, बंगला सिरोदी होते हुए समाप्त हो जाता है।
जुलूस में खर्च हो जाते हैं 55 से 60 हजार, इकट्ठा नहीं हो पा रहा चंदा
लाट साहब के जुलूस को निकालने में 55 से 60 हजार रुपए खर्च हो जाते हैं। यह खर्च लाट साहब की खातिरदारी के साथ ही उनकी सुरक्षा पर होता है। इसके साथ ही अन्य व्यवस्थाएं भी करनी होती हैं। इस खर्च को पूरा करने के लिए क्षेत्रीय लोगों से चंदा एकत्रित किया जाता है। लोग अपनी स्वेच्छा से लाट साहब के जुलूस को निकालने के लिए चंदा देते हैं, लेकिन इस बार रकम एकत्रित होना भी मुश्किल हो रहा है। अभी लोग चंदा देने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं, जबकि होली का त्योहार नजदीक है। आयोजकों की ओर से चंदे की अपील की गई है।