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कोरोना काल में उपेक्षित हुए खादी के उत्पाद

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शाहजहांपुर में गोविंदगंज स्थित गांधी आश्रम खादी भंडार ग्राहकों को राष्ट्रध्वज की बिक्री करता क? - फोटो : SHAHJAHANPUR
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शाहजहांपुर। खादी को भले ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन दर्शन का प्रतीक माना जाता हो, बापू के अनुयायी उसे उपेक्षित कर रहे हैं। इसीलिए खादी से बने वस्त्र और अन्य उत्पादों की बाजार में मांग अपेक्षा के अनुसार नहीं हो रही है। गोविंदगंज स्थित श्री गांधी आश्रम खादी भंडार पर विगत वित्त वर्ष 2019-20 में खादी उत्पादों की फुटकर बिक्री 90 प्रतिशत घटकर सिर्फ 3.67 लाख रुपये रह गई। बाद में बिक्री में आई कमी को पाटने में सरकारी विभागों का सहारा लेकर उन्हें 32 लाख रुपये के कंबलों की आपूर्ति की गई। बीते वित्त वर्ष में बिक्री का ग्राफ सुधरा, लेकिन खादी उत्पादों की मांग में ज्यादा वृद्धि नहीं हुई।
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भंडार के प्रभारी व्यवस्थापक कृपाचार्य वर्मा ने बताया कि गत वर्ष एक अप्रैल से बीती 31 मार्च तक बीते वित्त वर्ष में खादी वस्त्र, रेशमी वस्त्र, लघु उद्योग उत्पाद मिलाकर कुल 32.48 लाख रुपये का सामान बिका। विगत वित्त वर्ष से तुलना करने पर बिक्री का यह आंकड़ा संतोषजनक नहीं कहा जा सकता, फिर भी लोगों में खादी उत्पादों के प्रति मामूली रुझान बढ़ा है। बताया कि दो अक्तूबर को गांधी जयंती से लेकर 18 जनवरी को बापू की पुण्य तिथि तक खादी उत्पादों पर 20 फीसदी छूट लागू रहने के दौरान बिक्री थोड़ी बढ़ती है। राष्ट्रीय पर्वों पर राष्ट्रध्वज और चुनाव नजदीक आने पर खादी के कुर्ता-पायजामा की मांग बढ़ जाती है, लेकिन इस बार गांधी जयंती पर सिर्फ एक ध्वज बिका।
प्रभारी व्यवस्थापक का कहना है कि यदि प्रधानमंत्री के अनुरोध को स्वीकार कर प्रत्येक परिवार के लोग वर्ष में एक बार खादी वस्त्रों की खरीद को तत्पर हो जाएं तो सीमित संसाधनों से संचालित हो रहे गांधी आश्रम समूह की आय बढ़ने से अन्य संसाधन बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
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ग्रामोद्योग इकाइयों को नहीं मिल रहा बाजार
उप्र खादी ग्रामोद्योग बोर्ड ने बापू की ग्राम स्वराज की अवधारणा साकार करने के लिए खादी ग्रामोद्योग विकास एवं सतत प्रोत्साहन नीति क्रियान्वित की है। इस नीति से प्रधानमंत्री रोजगार स्रजन कार्यक्रम योजना (पीएमईजीपी) और मुख्यमंत्री ग्रामोद्योग रोजगार योजना (एमएमजीआरवाई) को जोड़े जाने के सार्थक नतीजे भी मिल रहे हैं। इन दोनों योजनाओं में गत वित्त वर्ष में 93 लाख रुपये मार्जिन मनी अनुदान देकर नए उद्यमियों की 31 इकाइयां स्थापित करने का जनपद को लक्ष्य दिया। ग्रामीण बेरोजगार युवाओं ने इन योजनाओं को कोरोना काल में हाथों-हाथ लिया। नतीजे में लक्ष्य से अधिक 36 इकाइयों को विभिन्न बैंकों से ऋण दिलाया और उनमें से 18 इकाइयों को अनुदान देकर उनमें उत्पादन शुरू कराया। इन इकाइयों में नूडल्स, अचार, मधुमक्खी पालन, मिनरल वाटर प्लांट, इंटरलॉकिंग ईंट, कंप्यूटर असेंबलिंग, बक्सा निर्माण, मिनी फ्लोर मिल, मिनी राइस मिल, नमकीन उद्योग आदि शामिल हैं। इन इकाइयों से जुड़े उद्यमियों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि बैंकों के चक्कर काटकर लोन मंजूर कराने के बाद उत्पादन शुरू करने पर उन्हें अपने उत्पादों की खपत के लिए बाजार नहीं मिल रहा है।
लघु उद्योग इकाई की स्थापना के लिए आवेदन मिलने के बाद से बैंकों से ऋण स्वीकृत होने तक विभागीय स्तर से संबंधित आवेदकों को पूरी मदद की जा रही है। कई आवेदकों के लिए मैनें स्वयं उनसे संबंधित बैंकों में जाकर उनके ऋण स्वीकृत कराए। ग्रामोद्योग से जुड़ी योजनाओं ने कोरोना काल में नौकरियां छोड़कर घरों को लौटे प्रवासी कामगारों को काम शुरू करने का बड़ा अवसर दिया। यह सही है कि ग्रामीण उद्योग इकाइयों के उत्पादों की खपत में बाजार का अभाव आड़े रहा है। विभाग इसके लिए स्वयं और उद्योग विभाग से आयोजित होने वाले कार्यक्रमों ग्रामीण उत्पादों का प्रदर्शन कराता है।
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-गजेंद्र सिंह, जिला ग्रामोद्योग अधिकारी
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