गांव-देहातों में शिक्षा की अलख जगाने के लिए ही शायद राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान चलाया गया होगा, लेकिन लगभग छह साल का अरसा बीतने के बाद भी योजना अपने उद्देश्यों की पूर्ति में विफल रही है। इन छह वर्षों में दो शैक्षिक सत्र को छोड़कर शेष चार सत्रों में अभी तक कुल 37 स्कूल भवन स्वीकृत किए गए, लेकिन स्टाफ की नियुक्ति किसी में नहीं की जा सकी। इन 37 स्कूलों में करीब 19 भवन विभाग को हैंडओवर किए जा चुके हैं। शेष 18 भवनों की स्वीकृति शैक्षिक सत्र 2013-14 में मिली। इन 18 भवनों का निर्माण कराने के लिए एक साल बाद पचास प्रतिशत धनराशि विभाग को उपलब्ध हुई है। भवन निर्माण की लागत प्रति विद्यालय रुपये 51.98 लाख है। इसमें 75 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार और 25 फीसदी प्रदेश सरकार को खर्च करनी है। नियुक्तियों का जिम्मा भी सूबे की सरकार के ही सिर पर है।
अच्छी सोच वाले सरकारी कामकाज की इतनी दुर्गति हो सकती है, इसका अंदाजा तो शायद सरकारों को भी नहीं लग पाता होगा। तभी तो लगातार खुलते जा रहे स्कूल भवन सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। वह इसलिए कि इन स्कूलों में स्टाफ की नियुक्तियां ही नहीं की जा रही हैं। स्कूल खुलते रहें, इसलिए पुराने राजकीय इंटर कॉलेजों से एक-एक शिक्षक लेकर उन्हें इन स्कूलों का दायित्व सौप दिया गया। मजेदार बात यह है कि दो ऐसे शिक्षक हैं, जिन्हें दो-दो स्कूलों का चार्ज दे दिया गया है। वह भी तब, जब राजकीय इंटर कॉलेजों में पहले से ही स्टाफ आधा चल रहा है। इन स्कूलों में पहले से ही पढ़ाई का संकट चल रहा है, अब एक-एक शिक्षक लेकर और आटा गीला कर दिया गया है। अब ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता की बात हो या फिर योजनाओं के क्रियान्वयन की, कही तो बेमानी ही जाएगी।
कब कहां-कितने स्कूल हुए स्वीकृत
शैक्षिक सत्र 2009-10 में खुटार, ददरौल और खुदागंज में कुल तीन, 2010-11 में जलालाबाद, निगोही और सिंधौली में कुल चार, 2011-12 में बंडा, खुटार, भावलखेड़ा, पुवायां, ददरौल, कांट, तिलहर, जैतीपुर, जलालाबाद और मिर्जापुर में कुल 13 राजकीय विद्यालय स्वीकृत किए गए। इसके बाद वर्ष 2013-14 में बंडा, पुवायां, सिंधौली, ददरौल, भावलखेड़ा, कांट, तिलहर, खुदागंज, जैतीपुर, निगोही, जलालाबाद, मिर्जापुर और कलान में कुल 18 विद्यालयों की स्वीकृति मिली है।
इस प्रकार होनी हैं नियुक्तियां
प्रत्येक विद्यालय में एक-एक प्रधानाचार्य और कनिष्ठ लिपिक, सात-सात शिक्षक तथा दो-दो चतुर्थश्रेणी कर्मचारियों की नियुक्ति की जानी है। इसमें चतुर्थश्रेणी कर्मचारियों की नियुक्तियां मानदेय आधार पर होंगी, लेकिन अभी तक किसी भी स्कूल में एक भी नियुक्ति नहीं की गई है। जिस हिसाब से काम चल रहा है उस हिसाब से अभी उम्मीद भी कम ही है।
मेरे पास है दो स्कूलों का चार्ज: शालिनी
राजकीय कन्या इंटर कॉलेज पुवायां की शिक्षिका शालिनी गुप्ता के ऊपर पुवायां के राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बितौनी और जुझारपुर का दायित्व है। वह बताती हैं कि दोनों स्कूलों के बीच करीब 12 किलोमीटर का फासला है। प्रत्येक स्कूल में लगभग 50-50 बच्चे हैं, स्टाफ नहीं होने से बहुत परेशानी हो रही है। गांववालों का भरपूर सहयोग मिलता है, फिर भी शिक्षकों का होना तो जरूरी है ही।
अलग ब्लाक के स्कूलों ने बढ़ाई मुश्किल: सुरेंद्र
राजकीय इंटर कॉलेज कांट के शिक्षक सुरेंद्र पाल सिंह बताते हैं कि उनके पास तिलहर के राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय नौगाई तथा मिर्जापुर के चितरऊ स्कूल का चार्ज है। दोनों स्कूल अलग-अलग विकास खंडों के हैं और दोनों के बीच की दूरी लगभग 32 किलोमीटर है। सुरेंद्र पाल बताते हैं कि वैसे तो उन्होंने एक-एक दिन बांट रखा है, लेकिन कभी-कभी प्रवेश आदि की समस्या खड़ी होने पर एक दिन में दोनों स्कूल देखने पड़ जाते हैं। बहुत मुश्किल हो गया है नौकरी करना।
आरईएस कराएगी भवन निर्माण
शैक्षिक सत्र 2013-14 में जिन 18 स्कूलों की स्वीकृति मिली थी, उनके भवन निर्माण के लिए राज्य परियोजना
कार्यालय लखनऊ से पचास प्रतिशत धन उपलब्ध करा दिया गया है। इससे पहले के 19 स्कूलों के अधिकांश भवन पूर्ण होकर विभाग को प्राप्त हो चुके हैं। एक अथवा दो स्कूलों का काम कुछ अपूर्ण है, जो शीघ्र ही पूरा कराया जा रहा है। नए 18 स्कूल भवनों का निर्माण आरईएस से कराया जाएगा।
- केके मिश्र, सहायक लेखाधिकारी