मोहर्रम की दस तारीख को इमामबाड़ों और घरों में ताजिए रख दिए गए। लोगों ने जगह-जगह सबीलें लगाईं और नियाज करवाई। इसी तारीख को पैगंबर-ए-इस्लाम के नवासे हजरत इमाम हुसैन की अपने 72 साथियों और घरवालों के साथ शहादत हुई थी। कहा जाता है कि हजरत इमाम हुसैन ने करबला के मैदान में बातिल के सामने सिर नहीं झुकाया और जाम-ए-शहादत पी लिया।
मोहल्ला दिलाजाक के इमामबाड़े में रखे ताजिए की जियारत के लिए सुबह से ही लोगों का आना शुरू हो गया। अकीदतमंद पूरे समय नियाज कराते रहे। यहां रखे ताजिए को शनिवार को जुलूस के साथ करबला में दफन किया जाएगा। यहां पर बड़ी तादाद में पैगी भी बनाए गए, जिन्होंने ताजिए के सामने मातम किया। पूरे इमामबाड़े में सजावट की गई और मेला भी लगाया गया है।
मोहल्ला झंडा में आस्ताने आलिया में इमाम हुसैन की नियाज कराई गई, जिसमें बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने शिरकत की। शहर में कई घरों में ताजिए रखे गए। शाही इमामबाड़ा घूरन तलैया में जलसे का आयोजन किया गया, जिसमें वक्ताओं ने हजरत इमाम हुसैन की शहादत पर तकरीर की।