पुवायां। गोमती की एक और सहायक नदी कठिना भी अवैध कब्जों की मार के चलते तमाम स्थानों पर सूख गई है। कई स्थानों पर कठिना का नामोनिशान ही मिट गया है। लोगों ने नदी को जोतकर खेती करना शुरू कर दिया है।
काठ (कोरों) के जंगलों से प्रवाहित होने के कारण नदी को कठिना नाम से जाना जाता है। यह नदी भी गोमती के ही समान सदानीरा रही है। कठिना का उद्गम स्थान पहले शाहजहांपुर और अब पीलीभीत जिले में स्थित मोतीझील है, जहां इसे लोकभाषा में भोगनई झील भी कहा जाता है। तकरीबन 150 किमी तक प्रवाहित होने वाली कठिना शाहजहांपुर जिले के चांदपुर, प्रसादपुर आदि गांवों से निकलती है। इसके बाद कठिना लखीमपुर खीरी के मैलानी जंगल से होते हुए मोहम्मदी क्षेत्र में आंवला बीट के जंगलों से बहती हुई सीतापुर जिले के अंतर्गत आने वाले बख्तौली गांव में गोमती नदी में मिल जाती है। यह नदी शाहजहांपुर और लखीमपुर जिलों की सीमा भी रेखांकित करती है।
आंवला और बेंत के जंगल की पहचान वाले कठिना नदी के सामने आज अपने वजूद को बचाने का संकट है। कभी तेज और निर्मल धारा से बहने वाली यह नदी जिले के भूगोल का खास हिस्सा थी। आज आलम यह है कि नदी कई स्थानों पर सूख गई है। इससे जहां जंगल पशु पक्षियों के सामने पानी पीने का संकट है। वहीं इलाके में सिंचाई की समस्या भी बढ़ रही है। कठिना के सूखने का असर गोमती पर भी पड़ रहा है। सहायक नदियों के सूखने के कारण गोमती की धार भी रुक गई है।
गोमती और वन्य जीवों की जीवन रेखा है कठिना
- बाघों की सैरगाह रही कठिना नदी न केवल वन्य जीवन के लिए अति महत्वपूर्ण मानी जाती है बल्कि यह किसानों की भी लाइफ लाइन है। अपने उद्गम क्षेत्र के बाद जब कठिना खुटार रेंज और लखीमपुर के महेशपुर के जंगलों के होकर गुजरती है तो इसका कछार बाघों की पसंदीदा जगह बन जाता है। खुटार रेंज केे जंगल किशनपुर सेंचुरी और दुधवा तक के जंगलों से सीधे जुड़े हैं जिस कारण तमाम वन्य पशु जंगल में रहते हैं। किसानों को सिंचाई के लिहाज से कठिना नदी बहुत उपयोगी है।
अनेक ऐतिहासिक घटनाओं की साक्षी है कठिना
कठिना नदी का ऐतिहासिक महत्व 1857 से जोड़ा जाता है जो मितौली के राजा लोने सिंह और अवध की रानी बेगम हजरत महल की ओर से अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत से शुरू होता है। नदी के उस पार से लछमिनिया तोप लगाकर राजा ने अंग्रेजों की सेना को कई दिन रोके रखा था। नदी के किनारे जंगलों के कारण क्रांतिकारी यहां डेरा डालते थे और मोटी लकड़ी पर तैरकर उस पार सुरक्षित पहुंच जाते थे। किवदंती के अनुसार गुरु द्रोणाचार्य ने इस नदी के संगम स्थल पर बख्तौली के करीब आश्रम बनाकर तपस्या की थी जो कुतुबनगर के दक्षिण पश्चिम में आज भी द्रोणाघाट (दोनवा) के नाम से प्रसिद्ध है।